सजे हुए कमरे में पाया। गुलाब और चंदन की सुगंधा आ रही थी। उसके सामने कुरसी पर वही महिला बैठी हुई थी, जिन्हें उसने सुषुप्तावस्था में सेंट मेरी समझा था, और सिरहाने की ओर एक वृध्द पुरुष बैठे थे, जिनकी ऑंखों से दया टपकी पड़ती थी। इन्हीं को कदाचित् उसने, अर्ध्द चेतना की दशा में, ईसा समझा था। स्वप्न की रचना स्मृतियों की पुनरावृत्ति-मात्रा होती है।

सोफ़िया ने क्षीण स्वर में पूछा-मैं कहाँ हूँ? मामा कहाँ हैं?

वृध्द पुरुष ने कहा-तुम कुँवर भरतसिंह के घर में हो। तुम्हारे सामने रानी साहबा बैठी हुई हैं, तुम्हारा जी अब कैसा है?

सोफ़िया-अच्छी हूँ, प्यास लगी है। मामा कहाँ हैं, पापा कहाँ हैं, आप कौन हैं?

रानी-यह डॉक्टर गांगुली हैं, तीन दिन से तुम्हारी दवा कर रहे हैं। तुम्हारे पापा-मामा कौन हैं?

सोफ़िया-पापा का नाम मि. जॉन सेवक है। हमारा बँगला सिगरा में है।

डॉक्टर-अच्छा, तुम मि. जॉन सेवक की बेटी हो? हम उसे जानता है; अभी बुलाता है।


91 of 1634

उनके पुरखों का पता नहीं चलता, और न हमें उसकी खोज करने की विशेष जरूरत है। हाँ इतनी बात अवश्य निश्चित है कि प्रभु ईसा की शरण जाने का गौरव ईश्वर सेवक को नहीं, उनके पिता को था। ईश्वर सेवक को अब भी अपना बाल्य जीवन कुछ-कुछ याद आता था, जब वह अपनी माता के साथ गंगास्नान को जाया करते थे। माता की दाह-क्रिया की स्मृति भी अभी न भूली थी। माता के देहांत के बाद उन्हें याद आता था कि मेरे घर में कई सैनिक घुस आए थे, और मेरे पिता को पकड़कर ले गए


91 of 2700