सामूहिक संगीत का गुण है, आत्मसमर्पण और उत्कर्ष का पवित्र संदेश विराट आकाश में, नील गगन में और सोफ़िया के अशांत हृदय में गूँजने लगा। वह अब तक धार्मिक विवेचन ही में रत रहती थी। राष्ट्रीय संदेश सुनने का अवसर उसे कभी न मिला था। उसके रोम-रोम से वही धवनि, दीपक-से ज्योति के समान निकलने लगी-

'मातृभूमि के लिए जगत में जीना औ' मरना होगा।'

उसके मन में एक तरंग उठी कि मैं भी जाकर गानेवालों के साथ गाने लगती। भाँति-भाँति के उद्गार उठने लगे-मैं किसी दूसरे देश में जाकर भारत कार् आत्तानाद सुनाती। यहीं खड़ी होकर कह दूँ, मैं अपने को भारत-सेवा के लिए समर्पित करती हूँ। अपने जीवन के उद्देश्य पर एक व्याख्यान देती-हम भाग्य के दु:खड़े रोने के लिए, अपनी अवनत दशा पर आँसू बहाने के लिए नहीं बनाए गए हैं।

समा बँधा हुआ था, सोफ़िया के हृदय की ऑंखों के सामने इन्हीं भावों के चित्र नृत्य करते हुए मालूम होते थे।


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नायकराम-पट्ठा बात बेलाग कहता है कि एक बार सुनकर फिर किसी की जबान नहीं खुलती।

ठाकुरदीन-अब भजन-भाव हो चुका। ढोल-मँजीरा उठाकर रख दो।

दयागिरि-तुम कल से यहाँ न आया करो, भैरों।

भैरों-क्यों न आया करें? मंदिर तुम्हारा बनवाया नहीं है। मंदिर भगवान् का है। तुम किसी को भगवान् के दरबार में आने से रोक दोगे?

नायकराम-लो बाबाजी, और लोगे, अभी पेट भरा कि नहीं?

जगधार-बाबाजी, तुम्हीं गम खा जाओ, इससे साधु-संतों की महिमा नहीं घटती। भैरों, साधु-संतों की बात का तुम्हें बुरा न मानना चाहिए।


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