सेवक फिटन पर जा बैठीं। संध्‍या हो गई थी। सड़क पर ईसाइयों के दल-के-दल कोई ओवरकोट पहने, कोई माघ की ठंड से सिकुड़े हुए, खुश गिरजे चले जा रहे थे, पर सोफ़िया को सूर्य की मलिन ज्योति भी असह्य हो रही थी, वह एक ठंडी साँस खींचकर बैठ गई। 'तेरे कर्मों से तेरे मुँह में कालिख लगेगी'-ये शब्द उसके अंत:करण को भाले के समान बेधाने लगे। सोचने लगी-मेरी स्वार्थ-सेवा का यही उचित दंड है। मैं भी केवल रोटियों के लिए अपनी आत्मा की हत्या कर रही हूँ, अपमान और अनादर के झोंके सह रही हूँ। इस घर में कौन मेरा हितैषी है? कौन है, जो मेरे मरने की खबर पाकर आँसू की चार बूँदें गिरा दे? शायद मेरे मरने से लोगों को खुशी होगी। मैं इनकी नज़रों में इतनी गिर गई हूँ। ऐसे जीवन पर धिाक्कार है। मैंने देखे हैं हिंदू-घरानों में भिन्न-भिन्न मतों के प्राण्ाी कितने प्रेम से रहते हैं। बाप सनातन-धार्मावलम्बी


80 of 1634



अभी ये ही बातें हो रही थीं कि सैयद ताहिर अली आकर खड़े हो गए, और नायकराम से बोले-पंडाजी, मुझे आपसे कुछ कहना है, जरा इधार चले आइए।

बजरंगी-उसी जमीन के बारे में कुछ बातचीत करनी है न? वह जमीन न बिकेगी।

ताहिर-मैं तुमसे थोड़े ही पूछता हूँ। तुम उस जमीन के मालिक-मुख्तार नहीं हो।

बजरंगी-कह तो दिया, वह जमीन न बिकेगी, मालिक-मुख्तार कोई हो।

ताहिर-आइए पंडाजी, आइए, इन्हें बकने दीजिए।

नायकराम-आपको जो कुछ कहना हो कहिए;


80 of 2700