सेवक बड़े शौक से गिरजा जाया करते थे, वहाँ उन्हें बनाव और दिखाव, पाखंड और ढकोसलों की दार्शनिक मीमांसा करने और व्यंग्योक्तियों के लिए सामग्री जमा करने का अवसर मिलता था। सोफ़िया के लिए आराधाना विनोद की वस्तु नहीं, शांति और तृप्ति की वस्तु थी। बोली-तुम्हारे लिए आसान हो, मेरे लिए मुश्किल ही है।
प्रभु सेवक-क्यों अपनी जान बवाल में डालती हो? मामा का स्वभाव तो जानती हो।
सोफ़िया-मैं तुमसे परामर्श नहीं चाहती, अपने कामों की जिम्मेदारी अपने ऊपर लेने को तैयार हूँ!
मिसेज़ सेवक ने आकर पूछा-सोफी, क्या सिर में दर्द इतना है कि गिरजे तक नहीं चल सकतीं?
सोफ़िया-जा क्यों नहीं सकती; पर जाना नहीं चाहती।
मिसेज़ सेवक-क्यों?
सोफ़िया-मेरी इच्छा। मैंने गिरजा जाने की प्रतिज्ञा नहीं की है।
मिसेज़ सेवक-क्या तू चाहती है कि हम कहीं मुँह दिखाने के लायक न रहें?
सोफ़िया-हरगिज नहीं, मैं सिर्फ इतना ही चाहती हूँ क आप मुझे चर्च जाने के लिए मजबूर न करें।
चाहो तो उसे पाप कहो। अब तक तो तुम्हारे ऊपर भगवान् की दया है, अपना-अपना काम करते हो; मगर ऐसे बुरे दिन आ रहे हैं, जब तुम्हें सेवा और टहल करके पेट पालना पड़ेगा, जब तुम अपने नौकर नहीं, पराए के नौकर हो जाओगे, तब तुममें नीतिधरम का निशान भी न रहेगा।
सूरदास ने ये बातें बड़े गंभीर भाव से कहीं, जैसे कोई ऋषि भविष्यवाणी कर रहा हो। सब सन्नाटे में आ गए। ठाकुरदीन ने चिंतित होकर पूछा-क्यों सूरे, कोई विपत आने वाली है क्या? मुझे तो तुम्हारी बातें सुनकर डर लग रहा है। कोई नई मुसीबत तो नहीं आ रही है?