ही चला जाए। मिठाइयों से पेट नहीं भर सकता। अम्माँ पैसे न देंगी। होंगे ही नहीं, किससे माँगेगी ज्यादा हठ करूँगा, तो रोने लगेंगी। सजल नेत्रा होकर बोला-सोफी, मैं भाग्यहीन आदमी हूँ, मुझे इसी दशा मेेंं रहने दो। मेरे साथ अपने जीवन का सर्वनाश न करो। मुझे विधााता ने दु:ख भोगने ही के लिए बनाया है। मैं इस योग्य नहीं कि तुम...। सोफी ने बात काटकर कहा-विनय, मैं विपत्तिा ही की भूखी हूँ। अगर तुम सुख-सम्पन्न होते, अगर तुम्हारा जीवन विलासमय होता, अगर तुम वासनाओं के दास होते, तो कदाचित् मैं तुम्हारी तरफ से मुँह फेर लेती। तुम्हारे सत्साहस और त्याग ही ने मुझे तुम्हारी तरफ खींचा है। विनय-अम्माँजी को तुम जानती हो, वह मुझे कभी क्षमा न करेंगी। सोफी-तुम्हारे प्रेम का आश्रय पाकर मैं उनके क्रोधा को शांत कर लूँगी। जब वह देखेंगी कि मैं तुम्हारे पैरों की जंजीर नहीं, तुम्हारे पीछे उड़नेवाली रज हूँ,
भैरों-वहाँ ताड़ी की दूकान के लिए कुछ देना तो न पड़ेगा?
नायकराम-कोई और खड़ा हो गया, तो चढ़ा-ऊपरी होगी ही।
जॉन सेवक-नहीं, तुम्हारा हक सबसे बढ़कर समझा जाएगा।
नायकराम-तो फिर तुम्हारी चाँदी है भैरों!
जॉन सेवक-तो अब मैं चलूँ पंडाजी, अब आपके दिल में मलाल तो नहीं है?
नायकराम-अब कुछ कहलाइए न, आपका-सा भलामानुस आदमी कम देखा।
जॉन सेवक चले गए तो बजरंगी ने कहा-कहीं सूरे राजी न हुए, तो?
नायकराम-हम तो राजी करेंगे! चार