जान-बूझकर एक अनुपयुक्त शब्द टाइप कर दिया, जिसे एक सरकारी पत्रा में न आना चाहिए। क्लार्क ने टोका-यह शब्द मत रखो। सोफी-क्यों, धान्यवाद न दूँ? क्लार्क-आज्ञा-पत्रा में धान्यवाद का क्या जिक्र? कोई निजी थोड़े ही है। सोफी-हाँ, ठीक है, यह शब्द निकाले देती हूँ। नीचे क्या लिखूँ। क्लार्क-नीचे कुछ लिखने की जरूरत नहीं। केवल मेरा हस्ताक्षर होगा। सोफी ने सम्पूर्ण आज्ञा-पत्रा पढ़कर सुनाया। क्लार्क-प्रिये, यह तुम बुरा कर रही हो। सोफी-कोई परवा नहीं, मैं बुरा ही करना चाहती हूँ। हस्ताक्षर भी टाइप कर दूँ? नहीं, (मुहर निकालकर) यह मुहर किए देती हूँ। क्लार्क-जो चाहो करो। जब तुम्हें अपनी जिद के आगे कुछ बुरा-भला नहीं सूझता, तो क्या कहूँ? सोफी-कहीं और तो इसकी नकल न होगी? क्लार्क-मैं कुछ नहीं जानता। यह कहकर मि. क्लार्क अपने शयन-गृह की ओर जाने लगे। सोफी ने कहा-आज इतनी जल्दी नींद आ गई?
तरह न मानूँगा। हाँ आपका मुँह देखके उनसे बैर न बढ़ाऊँगा। आपकी नम्रता ने मेरा सिर झुका दिया है। सच कहता हूँ, आपकी भलमनसी और शराफत ने मेरा गुस्सा ठंडा कर दिया, नहीं तो मेरे दिल में न जाने कितना गुबार भरा हुआ था। अगर आप थोड़ी देर और न आते, तो आज शाम तक छोटे साहब अस्पताल में होते। आज तक कभी मेरी पीठ में धूल नहीं लगी। जिंदगी में पहली बार मेरा इतना अपमान हुआ और पहली बार मैंने क्षमा करना भी सीखा। यह आपकी बुध्दि की बरकत है। मैं आपकी खोपड़ी को मान गया। अब साहब की दूसरी बात का जवाब दो बजरंगी।