दुर्बलता स्वीकार नहीं कर सकता, लेकिन दुराग्रह के मुकाबले में वह निष्क्रिय हो जाता है। तब उसकी एक नहीं चलती। सोफी ने कटाक्ष करते हुए कहा-अगर तुम्हारा जातीयर् कत्ताव्य तुम्हें प्यारा है, तो मुझे भी आत्मसम्मान प्यारा है। स्वदेश की अभी तक किसी ने व्याख्या नहीं की; पर नारियों की मान-रक्षा उसका प्रधाान अंग है और होनी चाहिए, इससे तुम इनकार नहीं कर सकते। यह कहकर वह स्वामिनी-भाव से मेज के पास गई और एक डाकेट का पत्रा निकाला, जिस पर एजेंट आज्ञा-पत्रा लिखा करता था। क्लार्क-क्या करती हो सोफी? खुदा के लिए जिद मत करो। सोफी-जेल के दारोगा के नाम हुक्म लिखूँगी। यह कहकर वह टाइपराइटर पर बैठ गई। क्लार्क-यह अनर्थ न करो सोफी, गजब हो जाएगा। सोफी-मैं गजब से क्या, प्रलय से भी नहीं डरती। सोफी ने एक-एक शब्द का उच्चारण करते हुए आज्ञा-पत्रा टाइप किया। उसने एक जगह


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नायकराम-भैंरों के, इसका जवाब दो। अब तो साहब ने तुमको कायल कर दिया!

भैरों-कायल क्या कर दिया, साहब यही कहते हैं न कि छोटे साहब को अक्कल नहीं है; तो वह कुएँ में क्यों नहीं कूद पड़ते, अपने दाँतों से अपना हाथ क्यों नहीं काट लेते? ऐसे आदमियों को कोई कैसे पागल समझ ले?

जॉन सेवक-जो आदमी न समझे कि किस मौके पर कौन काम करना चाहिए, किस मौके पर कौन बात करनी चाहिए, वह पागल नहीं तो और क्या है?

नायकराम-साहब, उन्हें मैं पागल तो किसी


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