जब तक सोफी गाती रही, मिस्टर क्लार्क बैठे सिर धाुनते रहे। जब वह चुप हो गई, तो उसके पास गए और उसकी कुर्सी की बाँहों पर हाथ रखकर, उसके मुँह के पास मुँह ले जाकर बोले-इन उँगलियों को हृदय में रख लूँगा। सोफी-हृदय कहाँ है? क्लार्क ने छाती पर हाथ रखकर कहा-यहाँ तड़प रहा है। सोफी-शायद हो, मुझे तो विश्वास नहीं आता। मेरा तो खयाल है, ईश्वर ने तुम्हें हृदय दिया ही नहीं। क्लार्क-सम्भव है, ऐसा ही हो। पर ईश्वर ने जो कसर रखी थी, वह तुम्हारे मधाुर स्वर ने पूरी कर दी। शायद उसमें सृष्टि करने की शक्ति है। सोफी-अगर मुझमें यह विभूति होती, तो आज मुझे एक अपरिचित व्यक्ति के सामने लज्जित न होना पड़ता। क्लार्क ने अधाीर होकर कहा-क्या मैंने तुम्हें लज्जित किया? मैंने! सोफी-जी हाँ, आपने। मुझे आज तुम्हारी निर्दयता से जितना दु:ख हुआ, उतना शायद और कभी न हुआ था। मुझे बाल्यावस्था


668 of 1634

रही भलमनसी, भगवान् ने चाहा तो जल्द ही सीख जाएँगे। बस, एक बार हमारे हाथ में फिर पड़ जाने दीजिए। हमने बड़े-बड़े को भलामानुस बना दिया, उनकी क्या हस्ती है।

जॉन सेवक-अगर आप इतनी आसानी से उसे भलमनसी सिखा सकें, तो कहिए आप ही के पास भेज दूँ; मैं तो सब कुछ करके हार गया।

नायकराम-बोलो भाई बजरंगी, साहब की बातों का जवाब दो, मुझसे तो बोला नहीं जाता, रात कराह-कराहकर काटी है। साहब कहते हैं, माफ कर दो, दिल में मलाल न रखो। मैं


668 of 2700