के विरुध्द उत्तार दिया-मर्ूच्छा में बहुधाा मुख पीला हो जाता है। सोफी-वही तो मैं भी कह रही थी कि उसकी दशा अच्छी नहीं, नहीं तो मर्ूच्छा ही क्यों आती। अच्छा हो कि आप उसे किसी कुशल डॉक्टर के सिपुर्द कर दें। मेरे विचार में अब वह अपने अपराधा की काफी सजा पा चुका है, उसे मुक्त कर देना उचित होगा। नीलकंठ-मेम साहब, उसकी सूरत पर न जाइए। आपको ज्ञात नहीं, यहाँ जनता पर उसका कितना प्रभाव है। वह रियासत में इतनी प्रचंड अशांति उत्पन्न कर देगा कि उसे दमन करना कठिन हो जाएगा। बड़ा ही जिद्दी है, रियासत से बाहर जाने पर राजी ही नहीं होता। क्लार्क-ऐसे विद्रोही को कैद रखना ही अच्छा है। सोफी ने उत्तोजित होकर कहा-मैं इसे घोर अन्याय समझती हूँ और मुझे आज पहली बार यह मालूम हुआ कि तुम इतने हृदय-शून्य हो! क्लार्क-मुझे तुम्हारा जैसा दयालु हृदय रखने का दावा नहीं। सोफी ने क्लार्क के
होता, तो उसके सिर भी यही विपत्ति पड़ती। उन्होंने दो-एक बार पिता के क्रोध को उकसाने की चेष्टा की; किंतु जॉन सेवक ने केवल एक बार उन्हें तीव्र दृष्टि से देखा, और उठकर चले गए। किसी कवि की यशेच्छा श्रोताओं के मौन पर इतनी मर्माहत न हुई होगी।
मिस्टर जॉन सेवक छलके हुए दूध पर ऑंसू न बहाते थे। प्रभु सेवक के कार्य की तीव्र आलोचना करना व्यर्थ था।वह जानते थे कि इसमें आत्मसम्मान कूट-कूटकर भरा हुआ है। उन्होंने स्वयं इस भाव का पोषण किया था। सोचने लगे-इस गुत्थी