सम्बंधा नहीं, आत्मिक सम्बंधा है। विनय ने सोफी का हाथ अपने हाथ में लिया, और उसकी ओर प्रेम-विह्नल नेत्राों से देखकर बोले-तो आज से तुम मेरी हो, और मैं तुम्हारा हूँ। सोफी का मस्तक विनय के हृदय-स्थल पर झुक गया, नेत्राों से जल-वर्षा होने लगी, जैसे काले बादल धारती पर झुककर एक क्षण में उसे तृप्त कर देते हैं। उसके मुख से एक शब्द भी न निकला, मौन रह गई। शोक की सीमा कंठावरोधा है, पर शुष्क और दाह-युक्त; आनंद की सीमा भी कंठावरोधा है, पर आर्द्र और शीतल। सोफी को अब अपने एक-एक अंग में, नाड़ियों की एक-एक गति में, आंतरिक शक्ति का अनुभव हो रहा था। नौका ने कर्णधाार का सहारा पा लिया था। अब उसका लक्ष्य निश्चित था। वह अब हवा के झोकों या लहरों के प्रवाह के साथ डावाँडोल न होगी, वरन् सुव्यवस्थित रूप से अपने पथ पर चलेगी। विनय भी दोनों पर खोले हुए आनंद
मिठुआ प्रसाद के इंतजार में वहीं बैठा हुआ था। उसे पैसे निकालकर दिए कि सत्तू -गुड़ खा ले। मिठुआ खुश होकर बनिए की दूकान की ओर दौड़ा। बच्चों को सत्तू और चबेना रोटियों से अधिक प्रिय होता है।
सूरदास के चले जाने के बाद कुछ देर तक लोग सन्नाटे में बैठे रहे। उसके विरोध ने उन्हें संशय में डाल दिया था। उसकी स्पष्टवादिता से सब लोग डरते थे। यह भी मालूम था कि वह जो कुछ कहता है, उसे पूरा कर दिखाता है। इसलिए आवश्यक था कि पहले सूरदास से निबट लिया जाए।