मैंने तुम्हारा दामन पकड़ लिया है और अब उसे किसी तरह नहीं छोड़ सकती; चाहे तुम ठुकरा ही क्यों न दो। मैंने आत्मसम्मान तक तुम्हें समर्पित कर दिया है। विनय, यह ईश्वरीय विधाान है, यह उसकी ही प्रेरणा है; नहीं तो इतना अपमान और उपहास सहकर तुम मुझे जिंदा न पाते। विनय ने सोफी के दिल की थाह लेने के लिए कहा-अगर यह ईश्वरीय विधाान है, तो उसने हमारे और तुम्हारे बीच में यह दीवार क्यों खड़ी कर दी है? सोफिया-यह दीवार ईश्वर ने नहीं खड़ी की, आदमियों ने खड़ी की है। विनय-कितनी मजबूत है! सोफिया-हाँ, मगर दुर्भेद्य नहीं। विनय-तुम इसे तोड़ सकोगी? सोफिया-इसी क्षण, तुम्हारी ऑंखों के एक इशारे पर। कोई समय था, जब मैं उस दीवार को ईश्वरकृत समझती थी और उसका सम्मान करती थी, पर अब उसका यथार्थ स्वरूप देख चुकी। प्रेम इन बाधााओं की परवा नहीं करता, यह दैहिक
नायकराम-अगर तुमने उधार पैर रखा, तो याद रखना, वहीं खोदकर गाड़ दूँगा। तुम्हें अंधा-अपाहिज समझकर तुम्हारी मुरौवत करता हूँ,नहीं तो तुम हो किस खेत की मूली! क्या तुम्हारे कहने से अपनी इज्जत गँवा दूँ, बाप-दादों के मुँह में कालिख लगवा दूँ! बड़े आए हो वहाँ से ज्ञानी बनके। तुम भीख माँगते हो, तुम्हें अपनी इज्जत की फिकिर न हो, यहाँ तो आज तक पीठ में धूल नहीं लगी।
सूरदास ने इसका कुछ जवाब न दिया। चुपके से उठा और मंदिर के चबूतरे पर जाकर लेट गया।