कहा-अनुग्रह गालियों के रूप में नहीं प्रकट किया जाता। विनय ने विस्मित होकर कहा-ऐसा घोर अपराधा मुझसे कभी नहीं हुआ। सोफिया-ख्वाहमखाह किसी शख्स के साथ मेरा सम्बंधा जोड़ना गाली नहीं तो क्या है? विनय-मिस्टर क्लार्क? सोफिया-क्लार्क को मैं तुम्हारी जूतियों का तस्मा खोलने के योग्य भी नहीं समझती। विनय-लेकिन अम्माँजी ने...। सोफिया-तुम्हारी अम्माँजी ने झूठ लिखा और तुमने उस पर विश्वास करके मुझ पर घोर अन्याय किया। कोयल आम न पाकर भी निम्बौड़ियों पर नहीं गिरती। इतने में क्लार्क ने आकर पूछा-इस कैदी की क्या हालत है? डॉक्टर आ रहा है, वह इसकी दवा करेगा। चलो, देर हो रही है। सोफिया ने रुखाई से कहा-तुम जाओ, मुझे फुरसत नहीं। क्लार्क-कितनी देर तक तुम्हारी राह देखूँ। सोफिया-यह मैं नहीं कह सकती। मेरे विचार में एक मनुष्य की सेवा करना सैर करने से कहीं अधिाक आवश्यक है। क्लार्क-खैर, मैं थोड़ी देर
निश्चिंत रहो। राजा साहब ने जो बात कह दी, उसे पत्थर की लकीर समझो। साहब सिर रगड़कर मर जाएँ, तो भी अब जमीन नहीं पा सकते।
सूरदास-जमीन की मुझे चिंता नहीं है। मरूँगा, तो सिर पर लाद थोड़े ही ले जाऊँगा। पर अंत में यह सारा पाप मेरे ही सिर पड़ेगा। मैं ही तो इस सारे तूफान की जड़ हूँ, मेरे ही कारन तो यह रगड़-झगड़ मची हुई है, नहीं तो साहब को तुमसे कौन दुसमनी थी।
नायकराम-यारो, सूरे को समझाओ।
जगधार-सूरे, सोचो, हम लोगों की कितनी बेआबरूई हुई है!