नाजुक है। मुझे इस वक्त धौर्य से काम लेना चाहिए। दारोगा से पूछा-मेम साहब यहाँ किस वक्त आएँगी? दारोगा-उनके आने का कोई ठीक समय थोड़े ही है। धाोखा देकर किसी ऐसे वक्त आ पहुँचेंगी, जब हम लोग गाफिल पड़े होंगे। इसी से तो कहता हूँ कि कमरे की सफाई कर डालो; कपड़े बदल लो; कौन जाने, आज ही आ जाएँ। विनय-अच्छी बात है; आप जो कुछ कहते हैं, सब कर लूँगा। अब आप निश्ंचित हो जाएँ। दारोगा-सलामी के वक्त आने से इनकार तो न करोगे? विनय-जी नहीं; आप मुझे सबसे पहले ऑंगन में मौजूद पाएँगे। दारोगा-मेरी शिकायत तो न करोगे? विनय-शिकायत करना मेरी आदत नहीं, इसे आप खूब जानते हैं। दारोगा चला गया। ऍंधोरा हो चला था। विनय ने अपने कमरे में झाड़ू लगाई, कपड़े बदले, कम्बल बिछा दिया। वह कोई ऐसा काम नहीं करना चाहते थे, जिससे किसी की दृष्टि उनकी ओर आकृष्ट
मैं तुम्हारा दुसमन हूँ भैया? मैंने तो अभी दूकान पर सुना। होस उड़ गए। साहब देखने में तो बहुत सीधा-सादा मालूम होता था। मुझसे हँस-हँसकर बातें कीं, यहाँ आकर न जाने कौन भूत उस पर सवार हो गया।
नायकराम-उसका भूत मैं उतार दूँगा, अच्छी तरह उतार दूँगा, जरा खड़ा तो होने दो। हाँ, जो कुछ राय हो, उसकी खबर वहाँ न होने पाए,नहीं तो चौकन्ना हो जाएगा।
बजरंगी-यहाँ हमारा ऐसा कौन बैरी बैठा हुआ है?
जगधार-यह न कहो, घर का भेदी लंका दाहे। कौन जाने,