सदैव रत रहती थी। धर्मतत्तवों को बुध्दि की कसौटी पर कसना उसका स्वाभाविक गुण था, और जब तक तर्क-बुध्दि स्वीकार न करे, वह केवल धर्म-ग्रंथों के आधार पर किसी सिध्दांत को न मान सकती थी। जब उसके मन में कोई शंका होती, तो वह प्रभु सेवक की सहायता से उसके निवारण की चेष्टा किया करती।
सोफ़िया-मैं इस विषय पर बड़ी देर से गौर कर रही हूँ; पर कुछ समझ में नहीं आता। प्रभु मसीह ने दरिद्रता को इतना महत्व क्यों दिया और धान-वैभव को क्यों निषिध्द बतलाया?
प्रभु सेवक-जाकर मसीह से पूछा।
सोफ़िया-तुम क्या समझते हो?
प्रभु सेवक-मैं कुछ नहीं समझता, और न कुछ समझना ही चाहता हूँ। भोजन, निद्रा और विनोद, ये ही मनुष्य-जीवन के तीन तत्तव हैं। इसके सिवा सब गोरखधंधा है। मैं धर्म को बुध्दि से बिल्कुल अलग समझता हूँ। धर्म को तोलने के लिए बुध्दि उतनी ही अनुपयुक्त है,
जगधार-अच्छा भैया, सूरदास के बराबर दुनिया में कोई दम नहीं बाँध सकता। अब खुश हुए।
सूरदास-भैया, इसमें झगड़ा काहे का? मैं कब कहता हूँ कि मुझे गाना आता है। तुम लोगों का हुक्म पाकर, जैसा भला-बुरा बनता है, सुना देता हूँ।
इतने में भैरों भी आकर बैठ गया। बजरंगी ने व्यंग करके कहा-क्या अब कोई ताड़ी पीनेवाला नहीं था? इतनी जल्दी क्यों दूकान बढ़ा दी?
ठाकुरदीन-मालूम नहीं, हाथ-पैर भी धोए हैं या वहाँ से सीधो ठाकुरजी के मंदिर में चले आए। अब सफाई तो कहीं रह ही नहीं गई।