जुलुम किया है, उनके दिल में दया-धारम जागे, बस मैं आप लोगों से और कुछ नहीं चाहता।' इतना सुनते ही कुछ लोग तो हट गए; मगर कितने ही आदमी बिगड़कर बोले-तुम देवता हो, तो बने रहो; हम देवता नहीं हैं, हम तो जैसे के साथ तैसा करेंगे। उन्हें भी तो गरीबों पर जुल्म करने का मजा मिल जाए।-यह कहकर वे लोग पत्थरों को उठा-उठाकर पटकने लगे। तब इस अंधो ने वह काम किया, जो औलिया ही कर सकते हैं। हुजूर, मुझे तो कामिल यकीन हो गया कि कोई फरिश्ता है। उसकी बातें अभी तक कानों में गूँज रही हैं। उसकी तसवीर अभी तक ऑंखों के सामने खिंची हुई है। उसने जमीन से एक बड़ा-सा पत्थर का टुकड़ा उठा लिया और उसे अपने माथे के सामने रखकर बोला-अगर तुम लोग अभी भी मेरी विनती न सुनोगे, तो इसी दम इस पत्थर से सिर टकराकर जान दे दूँगा। मुझे मर जाना मंजूर
सहसा भैरों सिर पर ताड़ी का घड़ा रखे आता हुआ दिखाई दिया। जगधार ने तुरंत खोंचा उठाया, बिना पैसे लिए कदम बढ़ाता हुआ दूसरी तरफ चल दिया। भैरों ने समीप आकर सलाम किया। प्रभु सेवक ने ऑंखें दिखाकर पूछा-तू ही भैरों ताड़ीवाला है न?
भैरों-(काँपते हुए) हाँ हुजूर, मेरा ही नाम भैरों है।
प्रभु सेवक-तू यहाँ लोगों के घरों में आग लगाता फिरता है?
भैरों-हुजूर, जवानी की कसम खाता हूँ, किसी ने हुजूर से झूठ कह दिया है।
प्रभु सेवक-तू कल मेरे गोदाम पर फौजदारी करने में शरीक था?