देता है। आज सुबह कई सौ आदमी लाठियाँ लिए आ गए और गोदाम को घेर लिया। कुछ लोग सीमेंट और चूने के ढेरों को बखेरने लगे, कई आदमी पत्थर की सिलों को तोड़ने लगे। मैं तनहा क्या कर सकता था? यहाँ मजदूर खौफ के मारे जान लेकर भागे। कयामत का सामना था। मालूम होता था, अब आन-की-आन में महशर बरपा हो जाएगा। दरवाजा बंद किए बैठा अल्लाह-अल्लाह कर रहा था कि किसी तरह हंगामा फरो हो। बारे दुआ कबूल हुई। ऐन उसी वक्त अंधाा न जाने किधार से आ निकला और बिजली की तरह कड़ककर बोला-'तुम लोग यह ऊधाम मचाकर मुझे क्यों कलंक लगा रहे हो? आग लगाने से मेरे दिल की आग न बूझेगी, लहू बहाने से मेरा चित्ता शांत न होगा। आप लोगों की दुआ से यह आग और जलन मिटेगी। परमात्मा से कहिए, मेरा दु:ख मिटाए। भगवान् से विनती कीजिए, मेरा संकट हरे। जिन्होंने मुझ पर
जगधार-सब मालूम हो गया, हुजूर, पर किया क्या जाए। कितना कहा गया कि उस पर थाने में रपट कर दे, मुआ कहता है, कौन किसी को फँसाए! जो कुछ भाग में लिखा था, वह हुआ। हुजूर, सारी करतूत इसी भैरों ताड़ीवाले की है।
प्रभु सेवक-कैसे मालूम हुआ? किसी ने उसे आग लगाते देखा?
जगधार-हुजूर, वह खुद मुझसे कह रहा था। रुपयों की थैली लाकर दिखाई। इससे बढ़कर और क्या सबूत होगा?
प्रभु सेवक-भैरों के मुँह पर कहोगे?
जगधार-नहीं सरकार, खून हो जाएगा।