भागिनी बनूँ? आप लोगों ने मेरी इच्छा के विरुध्द मेरे सिर पर एक महान् पातक का बोझ रख दिया है। मैं इसे सहन नहीं कर सकती। आपको अंधो की जमीन वापस करनी पड़ेगी। ये बातें हो ही रही थीं कि सैयद ताहिर अली ने सोफ़िया को मोटर में बैठे जाते देखा, तो तुरंत आकर सामने खड़े हो गए और सलाम किया। सोफी ने मोटर रोक दी और पूछा-कहिए मुंशीजी, इमारत बनने लगी? ताहिर-जी हाँ, कल दाग-बेल पड़ेगी; पर मुझे यह बेल मुड़े चढ़ती नहीं नजर आती। सोफ़िया-क्यों? क्या कोई वारदात हो गई? ताहिर-हुजूर, जब से इस अंधो ने शहर में आह-फरियाद शुरू की है, तब से अजीब मुसीबतों का सामना हो गया है। मुहल्लेवाले तो अब नहीं बोलते, लेकिन शहर के शोहदे-लुच्चे रोजाना आकर मुझे धामकियाँ देते हैं। कोई घर में आग लगाने को आमादा होता है, कोई लूटने को दौड़ता है, कोई मुझे कत्ल करने की धामकी
ने उसका झोंपड़ा बनाया है। अभी छुट्टी मिली है, तो खोंचा लेकर निकला हूँ। हुकुम हो, तो कुछ खिलाऊँ। कचालू खूब चटपटे हैं।
प्रभु सेवक का जी ललचा गया। खोंचा उतारने को कहा और कचालू, दही-बड़े, फुलौड़ियाँ खाने लगे। भूख लगी हुई थी। ये चीजें बहुत प्रिय लगीं। कहा-सूरदास ने तो यह बात मुझसे नहीं कही?
जगधार-वह कभी न कहेगा। कोई गला भी काट ले, तो शिकायत न करेगा।
प्रभुसेवक-तब तो वास्तव में कोई महापुरुष है। कुछ पता न चला, किसने झोंपड़े में आग लगाई थी?