ऊपर बहुत जब्र करके यह प्रस्ताव स्वीकार किया है। सोफी-आपने अपने ऊपर जब्र नहीं किया है, मेरे ऊपर किया है, और आपको इसका प्रायश्चित्ता करना पड़ेगा। क्लार्क-मैं न जानता था कि तुम इतनी न्यायप्रिय हो। सोफी-मेरी तारीफ करने से इस पाप का प्रायश्चित्ता न होगा। क्लार्क-मैं अंधो को किसी दूसरे गाँव में इतनी ही जमीन दिला दूँगा। सोफ़िया-क्या उसी की जमीन उसे नहीं लौटाई जा सकती? क्लार्क-कठिन है। सोफ़िया-असम्भव तो नहीं है? क्लार्क-असम्भव से कुछ ही कम है। सोफ़िया-तो समझ गई, असम्भव नहीं है, आपको यह प्रायश्चित्ता करना ही पड़ेगा। कल ही उस प्रस्ताव को मंसूख कर दीजिए। क्लार्क-प्रिये, तुम्हें मालूम नहीं, उसका क्या परिणाम होगा। सोफ़िया-मुझे इसकी चिंता नहीं। पापा को बुरा लगेगा, लगे। राजा साहब का अपमान होगा, हो। मैं किसी के लाभ या सम्मान-रक्षा के लिए अपने ऊपर पाप का भार क्यों लूँ? क्यों ईश्वरीय दंड की
जाता था। प्रभु सेवक को देखते ही सलाम करके खड़ा हो गया। प्रभु सेवक ने पूछा-तुम भी कल फौजदारी करनेवालों में थे?
जगधार-सरकार, मैं टके का आदमी क्या खाके फौजदारी करूँगा, और बिचारे सूरदास की क्या मजाल है कि सरकार के सामने अकड़ दिखाए। अपनी ही बिपत में पड़ा हुआ है। किसी ने रात को बिचारे की झोंपड़ी में आग लगा दी। बरतन-भाँड़ा सब जल गया। न जाने किस-किस जतन से कुछ रुपये जुटाए थे; वे भी लुट गए। गरीब ने सारी रात रो-रोकर काटी है। आज हम लोगों