ही असम्भव है, जितना ऊँट का सुई की नोक में जाना। उसके मन में शंका हो रही थी, क्या दरिद्र होना स्वयं कोई गुण है, और धानी होना स्वयं कोई अवगुण? उसकी बुध्दि इस कथन की सार्थकता को ग्रहण न कर सकती थी। क्या मसीह ने केवल अपने भक्तों को खुश करने के लिए ही धान की इतनी निंदा की है? इतिहास बतला रहा है कि पहले केवल दीन, दु:खी, दरिद्र और समाज के पतित जनता ने ही मसीह के दामन में पनाह ली। इसीलिए तो उन्होंने धान की इतनी अवहेलना नहीं की? कितने ही गरीब ऐसे हैं, जो सिर से पाँव तक अधर्म और अविचार में डूबे हुए हैं। शायद उनकी दुष्टता ही उनकी दरिद्रता का कारण है। क्या केवल दरिद्रता उनके सब पापों का प्रायश्चित्त कर देगी? कितने ही धानी हैं, जिनके हृदय आईने की भाँति निर्मल हैं। क्या उनका वैभव उनके सारे सत्कर्मों को मिटा देगा?

सोफ़िया सत्यासत्य के निरूपण में


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जगधार-अभी भैरों नहीं आया, उसके बिना रंग नहीं जमता।

बजरंगी-ताड़ी बेचता होगा। पैसे का लोभ बुरा होता है। घर में एक मेहरिया है और एक बुढ़िया माँ। मुआ रात-दिन हाय-हाय पड़ी रहती है। काम करने को तो दिन है ही, भला रात को तो भगवान् का भजन हो जाए।

जगधार-सूरे का दम उखड़ जाता है, उसका दम नहीं उखड़ता।

बजरंगी-तुम अपना खोंचा बेचो, तुम्हें क्या मालूम, दम किसे कहते हैं। सूरदास जितना दम बाँधते हैं, उतना दूसरा बाँधो, तो कलेजा फट जाए। हँसी-खेल नहीं है।


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