गर्दन में बाँहें डालकर कहती-तुमने प्रेम करना किससे सीखा? दोनों अब निरंतर साथ नजर आते, सोफ़िया दफ्तर में साहब का गला न छोड़ती, बार-बार चिट्ठियाँ लिखती-जल्द आओे, मैं तुम्हारी बाट जोह रही हूँ। और यह सारा प्रेमाभिनय केवल इसलिए था कि इंदु से अपमान का बदला लूँ। न्याय-रक्षा का अब उसे लेश-मात्रा धयान न था, केवल इंदु का दर्प-मर्दन करना चाहती थी। एक दिन वह मि. क्लार्क को पाँड़ेपुर की तरफ सैर कराने ले गई। जब मोटर गोदाम के सामने से होकर गुजरी, तो उसने ईंट और कंकड़ के ढेरों की ओर संकेत करके कहा-पापा बड़ी तत्परता से काम कर रहे हैं। क्लार्क-हाँ, मुस्तैद आदमी हैं। मुझे तो उनकी श्रमशीलता पर डाह होती है। सोफी-पापा ने धार्म-अधार्म का विचार नहीं किया। कोई माने या न माने, मैं तो यही कहूँगी कि अंधो के साथ अन्याय हुआ। क्लार्क-हाँ, अन्याय तो हुआ। मेरी तो बिल्कुल इच्छा


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किया, फिटन देखते ही दौड़ा। प्रभु सेवक ने फिटन रोक दी और कर्कश स्वर में बोले-क्यों सूरदास,माँगते हो भीख, बनते हो साधु और काम करते हो बदमाशों का? मुझसे फौजदारी करने का हौसला हुआ है?

सूरदास-कैसी फौजदारी हुजूर? मैं अंधा-अपाहिज आदमी भला क्या फौजदारी करूँगा।

प्रभु सेवक-तुम्हीं ने तो मुहल्लेवालों को साथ लेकर मेरे मुंशीजी पर हमला किया था और गोदाम में आग लगाने को तैयार थे?

सूरदास-सरकार, भगवान से कहता हूँ, मैं नहीं था। आप लोगों का माँगता हूँ, जान-माल का कल्यान मनाता हूँ, मैं क्या फौजदारी करूँगा?


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