नहीं होती। आ इसका प्रमाण मिल गया। लीजिए, जाती हूँ। मगर इतना कहे जाती हूँ कि चाहे पापा मेरा मुँह देखना भी पाप समझें, पर मैं इस विषय में कदापि चुप न बैठूँगी। इंदु कुछ नरम होकर बोली-आखिर तुम राजा साहब से क्या चाहती हो? 'क्या ऐश्वर्य पाकर बुध्दि भी मंद हो जाती है? 'मैं प्यादे से वजीर नहीं बनी हूँ।' 'खेद है, आपने अब तक मेरा आशय नहीं समझा।' 'खेद करने से तो बात मेरी समझ में न आएगी।' 'मैं चाहती हूँ कि सूरदास की जमीन उसे लौटा दी जाए।' 'तुम्हें मालूम है, इसमें राजा साहब का कितना अपमान होगा?' 'अपमान अन्याय से अच्छा है।' 'यह भी जानती हो कि जो कुछ हुआ, तुम्हारे...मि. क्लार्क की प्रेरणा से हुआ है?' 'यह तो नहीं जानती; क्योंकि इस विषय में मेरी उनसे कभी बातचीत नहीं हुई। लेकिन जानती भी, तो राजा साहब की मान-हानि के विचार से पहले राजा साहब
नहीं किया है, जितना मैं समझता था। आपके लड़कों में और मुहल्ले के लड़कों में मार-पीट हो रही थी। अपने लड़कों के रोने की आवाज सुनी और आपका खून उबलने लगा। देहातियों के लड़कों की इतनी हिम्मत कि आपके लड़कों को मारें! खुदा का गजब! आपकी शराफत यह अत्याचार न सह सकी। आपने औचित्य, दूरदर्शिता और सहज बुध्दि को समेटकर ताक पर रख दिया और उन दुस्साहसी लड़कों को मारने दौड़े। तो अगर आप-जैसे सभ्य पुरुष को बाल-संग्राम में हस्तक्षेप करते देखकर और लोग भी आपका