तरह उनके सत्कार्यों में हाथ बँटा सकती हैं। राजा साहब की सुकीर्ति आज सारे शहर में छाई हुई है; लेकिन बुरा न मानिएगा, कभी-कभी वह भी मुँह-देखी कर जाते हैं और बड़ों के आगे छोटों की परवा नहीं करते। 'शायद उनकी यह पहली शिकायत है, जो मेरे कान में आई है।' 'हाँ, दुर्भाग्यवश यह काम मेरे ही सिर पड़ा। सूरदास को तो आप जानती ही हैं। राजा साहब ने उसकी जमीन पापा को दे दी है। बेचारा आजकल गली-गली दुहाई देता फिरता है। पिता के विरुध्द एक शब्द भी मुँह से निकालना मेरे लिए लज्जास्पद है, यह समझती हूँ। फिर भी यह कहे बिना नहीं रहा जाता कि इस मौके पर राजा साहब को एक दीन प्राणी पर ज्यादा दया करनी थी।' इंदु ने सोफ़िया को प्रश्नसूचक नेत्राों से देखकर कहा-आजकल पिता से भी अनबन है क्या? सोफ़िया ने गर्व से कहा-न्याय औरर् कत्ताव्य के सामने पिता, पुत्रा या पति का पक्षपात
में मग्न थे, या सम्भवत: ईश्वर-भजन में तन्मय हो रहे थे, और विद्रोहियों का एक सशस्त्रा दल पहुँचकर आप पर हमले करने लगा।
ताहिर-हुजूर तो खुद ही चल रहे हैं, मैं क्या अर्ज करूँ, तहकीकात कर लीजिएगा।
प्रभु सेवक-सूर्य को सिध्द करने के लिए दीपक की जरूरत नहीं होती। देहाती लोग प्राय: बड़े शांतिप्रिय होते हैं। जब तक उन्हें भड़काया न जाए, लड़ाई-दंगा नहीं करते। आपकी तरह उन्हें ईश्वर-भजन से रोटियाँ नहीं मिलतीं। सारे दिन सिर खपाते हैं, तब रोटियाँ नसीब होती