लेने के लिए इंदु खुद निकल जाएगी, किंतु 15 मिनट इंतजार करने के बाद एक दासी आई और उसे अंदर ले गई। सोफ़िया ने जाकर देखा कि इंदु अपने बैठने के कमरे में दुशाला ओढ़े, ऍंगीठी के सामने एक कुर्सी पर बैठी हुई हैं। सोफ़िया ने कमरे में कदम रखा, तब भी इंदु कुर्सी से न उठी, यहाँ तक कि सोफ़िया ने हाथ बढ़ाया, तब भी रुखाई से हाथ बढ़ा देने के सिवा इंदु मुँह से कुछ न बोली। सोफ़िया ने समझा, इसका जी अच्छा नहीं है। बोली-सिर में दर्द है क्या? उसकी समझ ही में न आता था कि बीमारी के सिवा इस निष्ठुरता का और भी कोई कारण हो सकता है। इंदु ने क्षीण स्वर में कहा-नहीं, अच्छी तो हूँ। इस सर्दी-पाले में तो तुम्हें बड़ा कष्ट हुआ! सोफ़िया मानशीला स्त्राी थी। इंदु की इस निष्ठुरता से उसके दिल पर चोट-सी लगी। पहला विचार तो हुआ कि उलटे पाँव वापस जाऊँ; मगर यह सोचकर कि यह बहुत
ऐसी खबर लें कि यहाँ से भागते ही बने। ताहिर अली से सरोष होकर बोले-क्या बात हुई कि सब-के-सब बिगड़ खड़े हुए?
ताहिर-हुजूर, बिल्कुल बेसबब। मैं तो खुद ही इन सबों से जान बचाता रहता हूँ।
प्रभु सेवक-किसी कार्य के लिए कारण का होना आवश्यक है; पर आज मालूम हुआ कि वह भी दार्शनिक रहस्य है, क्यों?
ताहिर-(बात न समझकर) जी हाँ, और क्या!
प्रभुसेवक-जी हाँ, और क्या के क्या मानी? क्या आप बात भी नहीं समझते, या बहरेपन का रोग है? मैं कहता हूँ, बिना