अपनी चिंताओं में ऐसी व्यस्त हो रही थी कि सूरदास को बिल्कुल भूल-सी गई थी। उसकी फरियाद सुनकर उसका हृदय काँप उठा। इस दीन प्राणी पर इतना घोर अत्याचार! उसकी दयालु प्रकृति यह अन्याय न सह सकी। सोचने लगी-सूरदास को इस विपत्तिा से क्योंकर मुक्त करूँ? इसका उध्दार कैसे हो? अगर पापा से कहूँ तो हर्गिज न सुनेंगे। उन्हें अपने कारखाने की ऐसी धाुन सवार है कि वह इस विषय में मेरे मुँह से एक शब्द सुनना भी पसंद न करेंगे। बहुत सोच-विचार के बाद उसने निश्चय किया-चलकर इंदु से प्रार्थना करूँ। अगर वह राजा साहब से जोर देकर कहेगी, तो सम्भव है, राजा साहब मान जाएँ। पिता से विरोधा करके उसे बड़ा दु:ख होता था; पर उसकी धाार्मिक दृष्टि में दया का महत्तव इतना ऊँचा था कि उसके सामने पिता के हानि-लाभ की कोई हस्ती न थी। जानती थी, राजा साहब दीन-वत्सल हैं और उन्होंने सूरदास
का मेहमान हूँ, मानो ये सब तैयारियाँ मेरे लिए हो रही हैं। लेकिन अभी कह दूँ कि आप मेरे लिए यह कष्ट न उठाइए, मैं जिस दशा में हूँ, उसी में प्रसन्न हूँ, तो कुहराम मच जाए! अच्छी विपत्ति गले पड़ी, जाकर देहातियों पर रोब जमाइए, उन्हें धामकाइए, उनको गालियाँ सुनाइए। क्यों? इन सबों ने कोई नई बात नहीं की है। कोई उनकी जायदाद पर जबरदस्ती हाथ बढ़ाएगा, तो वे लड़ने पर उतारू हो ही जाएँगे। अपने स्वत्वों की रक्षा करने का उनके पास और साधान ही क्या है? मेरे मकान