नायकराम-सरकार, बिगड़ा तो इतना है कि जिस दिन डौंड़ी पिटी, उस दिन से घर नहीं आया। सारे दिन शहर में घूमता है; भजन गाता है और दुहाई मचाता है।
राजा साहब-तुम लोगों ने कुछ समझाया नहीं?
नायकराम-दीनबंधु, अपने सामने वह किसी को कुछ समझता ही नहीं। दूसरा आदमी हो, तो मार-पीट की धमकी से सीधा हो जाए; पर उसे तो डर-भय जैसे छू ही नहीं गया। उसी दिन से घर नहीं आया।
राजा साहब-तुम लोग उसे समझा-बुझाकर यहाँ लाओ। सारा संसार छान आए हो; एक मूर्ख को काबू में नहीं ला सकते?
नायकराम-सरकार, समझाना-बुझाना तो मैं नहीं जानता, जो हुकुम हो, हाथ-पैर तोड़कर बैठा दूँ, आज ही चुप हो जाएगा।
राजा साहब-छी, छी, कैसी बातें करते हो! मैं देखता हूँ, यहाँ पानी का नल नहीं है। तुम लोगों को तो बहुत कष्ट होता होगा। मिस्टर सेवक,आप यहाँ नल पहुँचाने का ठेका ले लीजिए।
सूरदास-दूसरा घर बनाएँगे।
मिठुआ-और कोई फिर आग लगा दे?
सूरदास-तो फिर बनाएँगे।
मिठुआ-और फिर लगा दे?
सूरदास-तो हम भी फिर बनाएँगे।
मिठुआ-और कोई हजार बार लगा दे?
सूरदास-तो हम हजार बार बनाएँगे।
बालकों को संख्याओं से विशेष रुचि होती है। मिठुआ ने फिर पूछा-और जो कोई सौ लाख बार लगा दे?
सूरदास ने उसी बालोचित सरलता से उत्तर दिया-तो हम भी सौ लाख बार बनाएँगे।
जब वहाँ राख की चुटकी भी न रही, तो सब लड़के किसी