हूँ, पर मेरी कौन सुनता है। मुझे तो सबने कुत्ता समझ लिया है। उसके भूँकने की कौन परवा करता है?
मिसेज़ सेवक ने धार्मानुराग और मितव्ययिता का पाठ भलीभाँति अभ्यस्त किया था। लज्जित होकर बोली-पापा, क्षमा कीजिए। आज सोफी ने शकर ज्यादा डाल दी थी। कल से आपको यह शिकायत न रहेगी, मगर करूँ क्या, यहाँ तो हलकी चाय किसी को अच्छी ही नहीं लगती।
ईश्वर सेवक ने उदासीन भाव से कहा-मुझे क्या करना है, कुछ कयामत तक तो बैठा रहूँगा नहीं, मगर घर के बरबाद होने के ये ही लक्षण हैं। ईसू, मुझे अपने दामन में छुपा।
मिसेज़ सेवक-मैं अपनी भूल स्वीकार करती हूँ। मुझे अंदाज से शकर निकाल देनी चाहिए थी।
ईश्वर सेवक-अरे, तो आज यह कोई नई बात थोड़े ही है! रोज तो यही रोना रहता है। जॉन समझता है, मैं घर का मालिक हूँ, रुपये कमाता हूँ, खर्च क्यों न करूँ? मगर धान
सूरदास मिट्ठू को लिए पहुँचा, तो संगत बैठ चुकी थी। सभासद आ गए थे, केवल सभापति की कमी थी। उसे देखते ही नायकराम ने कहा-तुमने बड़ी देर कर दी, आधा घंटे से तुम्हारी राह देख रहे हैं। यह लौंडा बेतरह तुम्हारे गले पड़ा है। क्यों नहीं इसे हमारे ही घर से कुछ माँगकर खिला दिया करते।
दयागिरि-यहाँ चला आया करे, तो ठाकुरजी के प्रसाद ही से पेट भर जाए।
सूरदास-तुम्हीं लोगों का दिया खाता है या और किसी का? मैं तो बनाने-भर को हूँ।
जगधार-लड़कों को इतना