मकोय। पादरी उनका बहुत सम्मान करता था। उनकी सारी उम्मत (अनुयायियों की मंडली) में इतना वयोवृध्द और दूसरा आदमी न था, उस पर धर्म का इतना प्रेमी! वह उसके धार्मोपदेशों को जितनी तन्मयता से सुनते थे और जितनी भक्ति से कीर्तन में भाग लेते थे, वह आदर्श कही जा सकती थी।

प्रात:काल था। लोग जलपान करके या छोटी हाजिरी खाकर, मेज पर से उठे थे। मि. जॉन सेवक ने गाड़ी तैयार करने का हुक्म दिया। ईश्वर सेवक ने अपनी कुरसी पर बैठे-बैठे चाय का एक प्याला पिया था, और झ्रुझला रहे थे कि इसमें शकर क्यों इतनी झोंक दी गई है। शकर कोई नियामत नहीं कि पेट फाड़कर खाई जाए, एक तो मुश्किल से पचती है, दूसरे इतनी महँगी। इसकी आधी शकर चाय को मजेदार बनाने के लिए काफी थी। अंदाज से काम करना चाहिए था, शकर कोई पेट भरने की चीज नहीं है। सैकड़ों बार कह चुका


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बजाते थे। मँजीरेवालों की संख्या घटती-बढ़ती रहती थी। जो और कुछ न कर सकता, वह मँजीरा ही बजाता था। सूरदास इस संगत का प्राण था। वह ढोल, मँजीरे, करताल, सारंगी, तँबूरा सभी में समान रूप से अभ्यस्त था, और गाने में तो आस-पास के कई मुहल्लों में उसका जवाब न था। ठुमरी-गजल से उसे रुचि न थी। कबीर, मीरा, दादू, कमाल, पलटू आदि संतों के भजन गाता था। उस समय उसका नेत्राहीन मुख अति आनंद से प्रफुल्लित हो जाता था। गाते-गाते मस्त हो जाता, तन-बदन की सुधि न रहती। सारी चिंताएँ, सारे क्लेश भक्‍ति -सागर में विलीन हो जाते थे।


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