खड़े थे और फाटक से थोड़ी दूर पर पीतल की दो तोपें रखी हुई थीं। फाटक पर मोटर रुक गई और दोनों सिपाही विनयसिंह को अंदर ले चले। दीवान साहब दीवानखाने में विराजमान थे। खबर पाते ही विनय को बुला लिया।
दीवान साहब का डील ऊँचा, शरीर सुगठित और वर्ण गौर था। अधोड़ हो जाने पर भी उनकी मुखश्री किसी खिले हुए फूल के समान थी। तनी हुई मूँछें थीं, सिर पर रंग-बिरंगी, उदयपुरी पगिया, देह पर एक चुस्त शिकारी कोट, नीचे उदयपुरी पाजामा और एक भारी ओवरकोट। छाती पर कई तमगे और सम्मान-सूचक चिद्द शोभा दे रहे थे। उदयपुरी रिसाले के साथ योरपीय महासमर में सम्मिलित हुए थे और वहाँ कई अवसरों पर अपने असाधारण्ा पुरुषार्थ से सेना-नायकों को चकित कर दिया। यह उसी सुकीर्ति का फल था कि वह इस पद पर नियुक्त हुए थे। सरदार नीलकंठसिंह नाम था। ऐसा तेजस्वी पुरुष विनयसिंह की निगाहों से कभी न गुजरा था।
सूरदास-झोंपड़े में जाने का कोई रास्ता ही नहीं है?
बजरंगी-अब तो अंदर-बाहर सब एक हो गया है। दीवारें जल रही हैं।
सूरदास-किसी तरह नहीं जा सकता?
बजरंगी-कैसे जाओगे? देखते नहीं हो, यहाँ तक लपटें आ रही हैं!
जगधार-सूरे, क्या आज चूल्हा ठंडा नहीं किया था?
नायकराम-चूल्हा ठंडा किया होता, तो दुसमनों का कलेजा कैसे ठंडा होता।
जगधार-पंडाजी, मेरा लड़का काम न आए, अगर मुझे कुछ भी मालूम हो। तुम मुझ पर नाहक सुभा करते हो।
नायकराम-मैं जानता हूँ जिसने लगाई है। बिगाड़ न दूँ, तो कहना।