मोटर कुछ दूर चली गई, तो विनय ने शोफर से पूछा-मुझे कहाँ लिए जाते हो? शोफर ने कहा-आपको दीवान साहब ने बुलाया है।
विनय ने और कुछ न पूछा। उन्हें उस समय भय के बदले हर्ष हुआ कि दीवान साहब से मिलने का यह अच्छा अवसर मिला। अब उनसे यहाँ की स्थिति पर बातें होंगी। सुना है, विद्वान् आदमी हैं। देखूँ, इस नीति का क्योंकर समर्थन करते हैं।
एकाएक शोफर बोला-यह दीवान एक ही पाजी है। दया करना तो जानता ही नहीं। एक दिन बचा को इसी मोटर से ऐसा गिराऊँगा कि हड़डी -पसली का पता न लगेगा।
विनय-जरूर गिराओ, ऐसे अत्याचारियों की यही सजा है।
शोफर ने कुतूहलपूर्ण नेत्रों से विनय को देखा। उसे अपने कानों पर विश्वास न हुआ। विनय के मुँह से ऐसी बात सुनने की उसे आशा न थी। उसने सुना था कि वह देवोपम गुणों के आगार हैं, उनका हृदय पवित्र है। बोला-आपकी भी यही इच्छा है?
जगधार-घर में रुपये गड़े हैं; रोए उसकी बला। भीख तो दिखाने की माँगता है।
भैरों-अब रोएगा। ऐसा रुलाऊँगा कि छठी का दूध याद आ जाएगा।
यों बातें करते हुए दोनों अपने-अपने घर गए। रात के दो बजे होंगे कि अकस्मात् सूरदास की झोंपड़ी से ज्वाला उठी। लोग अपने-अपने द्वारों पर सो रहे थे। निद्रावस्था में भी उपचेतना जागती रहती है। दम-के-दम में सैकड़ों आदमी जमा हो गए। आसमान पर लाली छाई हुई थी, ज्वालाएँ लपक-लपककर आकाश की ओर दौड़ने लगीं। कभी उनका