इसी उद्विग्न दशा में करवटें बदलते-बदलते विनय की ऑंखें झपक गईं। पहाड़ी देशों में रातें बड़ी सुहावनी होती हैं। एक ही झपकी में तड़का हो गया। मालूम नहीं वह कब तक पड़े सोया करते; लेकिन पानी के झींसे मुँह पर पड़े, तो घबड़ाकर उठ बैठे। बादल घिरे हुए थे और हलकी-हलकी फुहार पड़ रही थी। जसवंतनगर चलने का विचार करके उठे थे कि कई आदमियों को घोड़े भगाए अपनी तरफ आते देखा। समझे, शायद वीरपालसिंह और उनके साथी होंगे; पर समीप आए, तो मालूम हुआ कि रियासत की पुलिस के आदमी हैं। डाकिया उनके पास ही सोया हुआ था, पर उसका कहीं पता न था, वह पहले ही उठकर चला गया था।
अफसर ने पूछा-तुम्हारा ही नाम विनयसिंह हैं?
'जी हाँ।'
'कल रात को तुम्हारे साथ कई आदमियों ने यहाँ पड़ाव डाला था?'
'जी नहीं, मेरे साथ केवल यहाँ के डाकघर का एक डाकिया था।'
भैरों-तुम्हीं क्यों नहीं लड़ जाते, तुम्हीं इनाम ले लेना।
जगधार को रुपयों की नित्य चिंता रहती थी। परिवार बड़ा होने के कारण किसी तरह चूल न बैठती थी, घर में एक-न-एक चीज घटी ही रहती थी। धानोपार्जन के किसी उपाय को हाथ से न छोड़ना चाहता था। बोला-क्यों सूरे, हमसे लड़ोगे?
सूरदास-तुम्हीं आ जाओ, कोई सही।
जगधार-क्यों पंडाजी, इनाम दोगे न?
नायकराम-इनाम तो भैरों के लिए था, लेकिन कोई हरज नहीं! हाँ, शर्त यह है कि एक ही झपट्टे में गिरा दो।
जगधार