विनय-इसकी चिंता नहीं। संतोष तो हो जाएगा कि मैंने अपनेर् कर्तव्य का पालन किया! मुझे तुमसे भी कुछ कहना है। तुम्हारा यह विचार कि इन हत्याकांडों से अधिकारीवर्ग प्रजापरायण हो जाएगा, मेरी समझ में निर्मूल और भ्रमपूर्ण है। रोग का अंत करने के लिए रोगी का अंत कर देना न बुध्दि-संगत है, न न्याय-संगत। आग आग से शांत नहीं होती, पानी से शांत होती है।
वीरपाल-महाराज, हम आपसे तर्क तो नहीं कर सकते; पर इतना जानते हैं कि विष विष ही से शांत होता है। जब मनुष्य दुष्टता की चरम सीमा पर पहुँच जाता है, उसमें दया और धर्म लुप्त हो जाता है, जब उसके मनुष्यत्व का सर्वनाश हो जाता है, जब वह पशुओं के-से आचरण करने लगता है, जब उसमें आत्मा की ज्योति मलिन हो जाती है, तब उसके लिए केवल एक ही उपाय शेष रह जाता है, और वह है प्राणदंड। व्याघ्र-जैसे हिंसक पशु सेवा
हड्डीयां तोड़ूँगा, सारा बगुलाभगतपन निकल जाएगा। बहुत दिनों से तुम्हारा रंग देख रहा हूँ, आज सारी कसर निकाल लूँगा।
सूरदास-मेरा क्या छैलापन तुमने देखा? बस, यही न कि मैंने सुभागी को घर से निकाल नहीं दिया?
भैरों-बस, अब चुप ही रहना। ऐसे पापी न होते, तो भगवान् ने ऑंखें क्यों फोड़ दी होतीं। भला चाहते हो, तो सामने से हट जाओ।
सूरदास-मेरे घर में तुम उसे न मारने पाओगे; यहाँ से चली जाए, तो चाहे जितना मार लेना।
भैरों-हटता है सामने से कि नहीं?