सवार-जान इतनी प्यारी है, तो रुपये क्यों नहीं देता?

विनय-जान भी प्यारी है और रुपये भी प्यारे हैं। दो में से एक भी नहीं दे सकता।

सवार-तो दोनों ही देने पड़ेंगे।

विनय-तो पहले मेरा काम तमाम कर दो। जब तक मैं हूँ, तुम्हारा मनोरथ न पूरा होगा।

सवार-हम साधु-संतों पर हाथ नहीं उठाते। सामने से हट जाओ।

विनय-जब तक मेरी हड्डीयां तुम्हारे घोड़ों के पैरों-तले न रौंदी जाएँगी, मैं सामने से न हटूँगा।

सवार-हम कहते हैं, सामने से हट जाओ। क्यों हमारे सिर हत्या का पाप लगाते हो?

विनय-मेरा जो धर्म है, वह मैं करता हूँ; तुम्हारा जो धर्म हो, वह तुम करो। गरदन झुकाए हुए हूँ।

दूसरा सवार-तुम कौन हो?

तीसरा सवार-बेधा हुआ है, मार दो एक हाथ, गिर पड़े, प्रायश्चित्त कर लेंगे।

पहला सवार-आखिर तुम हो कौन?

विनय-मैं कोई हूँ, तुम्हें इससे मतलब?


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नहीं पालता। खोटा आदमी है, कौन उससे रार मोल ले! ठाकुरदीन के द्वार बंद थे। सूरदास बैठा खाना पका रहा था। उसकी झोपड़ी में घुस गई और बोली-सूरे, आज रात-भर मुझे पड़े रहने दो, मारे डालता है, अभी जाऊँगी, तो एक हड्डी भी न बचेगी।

सूरदास ने कहा-आओ, लेट रहो, भोरे चली जाना, अभी नसे में होगा।

दूसरे दिन जब भैरों को यह बात मालूम हुई, तो सूरदास से गाली-गलौज की और मारने की धमकी दी। सुभागी उसी दिन से सूरदास पर स्नेह करने लगी। जब अवकाश


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