विनय-भाई, मैं तो मजबूर हूँ। चला ही नहीं जाता।
डाकिया-मैं आपको कंधो पर बैठाकर ले चलूँगा; पर यहाँ न छोड़ूँगा।
विनय-भाई, तुम बहुत दिक कर रहे हो। चलो, लेकिन मैं धीरे-धीरे चलूँगा। तुम न होते, तो आज मैं यहीं पड़ रहता।
डाकिया-आप न होते, तो मेरी जान की कुशल न थी। यह न समझिए कि मैं केवल आपकी खातिर इतनी जिद कर रहा हूँ, मैं इतना पुण्यात्मा नहीं हूँ। अपनी रक्षा के लिए आपको साथ लिए चलता हूँ। (धीरे से) मेरे पास इस वक्त ढाई सौ रुपये हैं। दोपहर को एक जगह सो गया, बस देर हो गई। आप मेरे भाग्य से मिल गए, नहीं तो डाकुओं से जान न बचती।
विनय-यह तो बड़े जोखिम की बात है। तुम्हारे पास कोई हथियार है?
डाकिया-मेरे हथियार आप हैं। आपके साथ मुझे कोई खटका नहीं है। आपको देखकर किसी डाकू की मजाल नहीं कि मुझ पर हाथ उठा सके। आपने डकैतों को भी वश में कर लिया है।
जगधार-प्याज के बिना मटर क्या अच्छे लगेंगे?
बुढ़िया-प्याज तो अभी कल ही धोले का आया था। घर में कोई चीज तो बचती ही नहीं। न जाने इस चुड़ैल का पेट है या भाड़।
सुभागी-मुझसे कसम ले लो, जो प्याज हाथ से भी छुआ हो। ऐसी जीभ होती, तो इस घर में एक दिन भी निबाह न होता।
भैरों-प्याज नहीं था, तो लाई क्यों नहीं?
जगधार-जो चीज घर में न रहे, उसकी फिकर रखनी चाहिए।
सुभागी-मैं क्या जानती थी कि आज आधी रात को प्याज की धुन सवार होगी।
भैरों ताड़ी