खुशामद करो, क्योंकि खुशामद की रोटियाँ खाते हो। यहाँ किसी के दबैल नहीं हैं।

बजरंगी-ले अब चुप ही रहना भैरों, बहुत हो चुका। छोटा मुँह, बड़ी बात।

नायकराम-तो भैरों को धामकाते क्या हो? क्या कोई भगोड़ा समझ लिया है? तुमने जब दंगल मारे थे, तब मारे थे, अब तुम वही नहीं हो। आजकल भैरों की दुहाई है।

भैरों नायकराम के व्यंग्य-हास्य पर झल्लाया नहीं, हँस पड़ा। व्यंग्य में विष नहीं था, रस था। संखिया मरकर रस हो जाती है।

भैरों का हँसना था कि लोगों ने अपने-अपने साज सँभाले, और भजन होने लगा। सूरदास की सुरीली तान आकाश-मंडल में यों नृत्य करती हुई मालूम होती थी, जैसे प्रकाश-ज्योति जल के अंतस्तल में नृत्य करती है-

''झीनी-झीनी बीनी चदरिया।

काहे कै ताना, काहे कै भरनी, कौन तार से बीनी चदरिया?

इँगला-पिंगला ताना-भरनी, सुखमन तार से बीनी चदरिया।

आठ कँवल-दस-चरखा डोले, पाँच तत्ता, गुन तीनी चदरिया;


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मगर देख लेना, जो चुल्लू-भर पानी को भी पूछे। मेरी बात गाँठ बाँध लो। पराया लड़का कभी अपना नहीं होता। हाथ-पाँव हुए, और तुम्हें दुत्कारकर अलग हो जाएगा। तुम अपने लिए साँप पाल रहे हो।

सूरदास-जो कुछ मेरा धरम है, किए देता हूँ। आदमी होगा, तो कहाँ तक जस न मानेगा। हाँ, अपनी तकदीर ही खोटी हुई, तो कोई क्या करेगा। अपने ही लड़के क्या बड़े होकर मुँह नहीं फेर लेते?

जमुनी-क्यों नहीं कह देते, मेरी भैंसें चरा लाया करे। जवान तो हुआ, क्या जन्मभर नन्हा ही


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