विनयसिंह को जाब्ते के शिकंजे में खींचने का आयोजन किया जाता है। दरबार ने इन सूचनाओं से आशंकित होकर कई गुप्तचरों को विनय के आचार-विचार की टोह लगाने के लिए तैनात कर दिया है; पर उनकी नि:स्पृह सेवा किसी को उन पर आघात करने का अवसर नहीं देती।
विनय के पाँव में बेवाय फटी थी; चलने में कष्ट होता था। बरगद के नीचे ठंडी-ठंडी हवा जो लगी, तो बैठे-बैठे सो गए। ऑंख खुली, तो दोपहर ढल चुकी थी। झपटकर उठ बैठे, लकड़ी सँभाली और आगे बढ़े। आज उन्होंने जसवंतनगर में विश्राम करने का विचार किया था। दिन भागा चला जाता था। तीसरे पहर के बाद सूर्य की गति तीव्र हो जाती है। संध्या होती जाती थी और अभी जसवंतनगर का कहीं पता न था। इधार बेवाय के कारण एक-एक कदम उठाना दुस्सह था। हैरान थे, क्या करूँ? किसी किसान का झोंपड़ा भी नजर न आता था कि वहाँ रात काटें।
और उसे गालियों ही से संतोष न होता, ज्योंही भैरों दूकान से आता, एक-एक की सौ-सौ लगाती। भैरों सुनते ही जल उठता,.कभी जली-कटी बातों से और कभी डंडों से स्त्री की खबर लेता। जगधार से उसकी गहरी मित्रता थी। यद्यपि भैरों का घर बस्ती के पश्चिम सिरे पर था, और जगधार का घर पूर्व सिरे पर, किंतु जगधार की यहाँ बहुत आमद-रफ्त थी। यहाँ मुफ्त में ताड़ी पीने को मिल जाती थी, जिसे मोल लेने के लिए उसके पास पैसे न थे। उसके घर में खानेवाले बहुत थे, कमानेवाला अकेला वही