दयागिरि-भैरों, तुम सचमुच बड़े झगड़ालू हो। जब तुम्हें प्रियवचन बोलना नहीं आता, तो चुप क्यों नहीं रहते? बहुत बातें करना बुध्दिमानी का लक्षण नहीं, मूर्खता का लक्षण है।
भैरों-ठाकुरजी के भोग के बहाने से रोज छाछ पा जाते हो न? बजरंगी की जय क्यों न मनाओगे!
नायकराम-पट्ठा बात बेलाग कहता है कि एक बार सुनकर फिर किसी की जबान नहीं खुलती।
ठाकुरदीन-अब भजन-भाव हो चुका। ढोल-मँजीरा उठाकर रख दो।
दयागिरि-तुम कल से यहाँ न आया करो, भैरों।
भैरों-क्यों न आया करें? मंदिर तुम्हारा बनवाया नहीं है। मंदिर भगवान् का है। तुम किसी को भगवान् के दरबार में आने से रोक दोगे?
नायकराम-लो बाबाजी, और लोगे, अभी पेट भरा कि नहीं?
जगधार-बाबाजी, तुम्हीं गम खा जाओ, इससे साधु-संतों की महिमा नहीं घटती। भैरों, साधु-संतों की बात का तुम्हें बुरा न मानना चाहिए।
भैरों-तुम
बुध्दू दास उठेंगे, तो पाव के बदले आधा सेर दे डालेंगे। चटपट रसोई से निकल आई। एक कुल्हिया में आधा पानी लिया, ऊपर से दूध डालकर सूरदास के पास आई और विषाक्त हितैषिता से बोली-यह लो, लौंडे की जीभ तुमने ऐसी बिगाड़ दी है कि बिना दूध के कौर नहीं उठाता। बाप जीता था, तो भर-पेट चने भी न मिलते थे, अब दूध के बिना खाने ही नहीं उठता।
सूरदास-क्या करूँ भाभी, रोने लगता है, तो तरस आता है।
जमुनी-अभी इस तरह पाल-पोस रहे हो कि एक दिन काम आएगा,