इंदु-मैं इसे बदनामी नहीं समझती।
राजा साहब-फिर सोच लो। यह मानी हुई बात है कि वह जमीन मि. सेवक को अवश्य मिलेगी। मैं रोकना भी चाहूँ, तो नहीं रोक सकता,और यह भी मानी हुई बात है कि इस विषय में तुम्हें मौनव्रत का पालन करना पड़ेगा।
राजा साहब अपने सार्वजनिक जीवन में अपनी सहिष्णुता और मृदु व्यवहार के लिए प्रसिध्द थे; पर निजी व्यवहारों में वह इतने क्षमाशील न थे। इंदु का चेहरा तमतमा उठा, तेज होकर बोली-अगर आपको अपना सम्मान प्यारा है, तो मुझे भी अपना धर्म प्यारा है।
राजा साहब गुस्से के मारे वहाँ से उठकर चले गए और इंदु अकेली रह गई।
साठ-आठ दिनों तक दोनों के मुँह में दही जमा रहा। राजा साहब कभी घर में आ जाते, तो दो-चार बातें करके यों भागते, जैसे पानी में भीग रहे हों। न वह बैठते, न इंदु उन्हें बैठने को कहती। उन्हें यह दु:ख था
भी उन्हें तस्कीन न हुई, जनाने मकान में घुस गए; और अगर स्त्रियाँ अंदर से द्वार न बंद कर लें तो उनकी आबरू बिगड़ने में कोई संदेह न था। इनके तो ऐसी चोटें लगी हैं कि शायद महीनों चलने-फिरने लायक न हों, कंधो की हड्डी टूट गई है।
महेंद्रकुमार सिंह स्त्रियों का बड़ा सम्मान करते थे। उनका अपमान होते देखकर तैश में आ जाते थे। रौद्र रूप धारण करके बोले-सब जनाने में घुस गए!
जॉन सेवक-किवाड़ तोड़ना चाहते थे, मगर चमारों ने धामकाया तो हट गए।
महेंद्रकुमार-कमीने! स्त्रियों पर अत्याचार करना चाहते थे!