उसका ओछापन ही अच्छा। ईश्वर करे, वह मुझसे सीधो मुँह बात न करे, तब देखनेवाले उसे मन में धिक्कारेंगे इसी में अब मेरी लाज रह सकती है; पर वह इतनी अविचारशील कहाँ है!

अंत में इंदु ने निश्चय किया-मैं सोफ़िया से मिलूँगी ही नहीं। मैं अपने रानी होने का अभिमान तो उससे कर ही नहीं सकती। हाँ, एक जाति-सेवक की पत्नी बनकर, अपने कुलगौरव का गर्व दिखाकर उसकी उपेक्षा कर सकती हूँ।

ये सब बातें एक क्षण में इंदु के मन में आ गईं। बोली-मैं आपको कभी दबने की सलाह न दूँगी।

राजा साहब-और यदि दबना पड़े?

इंदु-तो अपने को अभागिनी समझूँगी।

राजा साहब-यहाँ तक तो कोई हानि नहीं; पर कोई आंदोलन तो न उठाओगी? यह इसलिए पूछता हूँ कि तुमने अभी मुझे यह धमकी दी है।

इंदु-मैं चुपचाप न बैठूँगी। आप दबें, मैं क्यों दबूँ?

राजा साहब-चाहे मेरी कितनी ही बदनामी हो जाए?


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जॉन सेवक का कार्ड पहुँचा। झुँझलाए, लेकिन शील आ गया, बाहर निकल आए। मिस्टर सेवक ने कहा-क्षमा कीजिएगा, आपको कुसमय कष्ट हुआ, किंतु पाँड़ेपुरवालों ने इतना उपद्रव मचा रखा है कि मेरी समझ में नहीं आता, आपके सिवा किसका दामन पकड़ूँ। कल सबों ने मिलकर गोदाम पर धावा कर दिया। शायद आग लगा देना चाहते थे, पर आग तो न लगा सके; हाँ, यह मेरे एजेंट हैं, सब-के-सब इन पर टूट पड़े। इनको और इनके भाइयों को मारते-मारते बेदम कर दिया। इतने पर


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