राजा साहब-तुम जानती हो, मि. सेवक की यहाँ के अधिकारियों से कितनी राह-रस्म है। मिस्टर क्लार्क तो उनके द्वार के दरबान बने हुए हैं। अगर मैं उनकी इतनी सेवा न कर सका, तो हुक्काम का विश्वास मुझ पर से उठ जाएगा।
इंदु ने चिंतित स्वर में कहा-मैं नहीं जानती थी कि प्रधान की दशा इतनी शोचनीय होती है।
राजा साहब-अब तो मालूम हो गया। बतलाओ, अब मुझे क्या करना चाहिए?
इंदु-पद-त्याग।
राजा साहब-मेरे पद त्याग से जमीन बच सकेगी?
इंदु-आप दोष-पाप से तो मुक्त हो जाएँगे!
राजा साहब-ऐसी गौण बातों के लिए पद-त्याग हास्यजनक है।
इंदु को अपने पति के प्रधान होने का बड़ा गर्व था। इस पद को वह बहुत श्रेष्ठ और आदरणीय समझती थी। उसका ख्याल था कि यहाँ राजा साहब पूर्ण रूप से स्वतंत्रा हैं, बोर्ड उनके अधाीन है, जो चाहते हैं, करते हैं, पर अब विदित हुआ
का अख्तियार क्या मिल गया, सबों के दिमाग फिर गए। मिस्टर क्लार्क कहते थे कि अगर राजा साहब जमीन का मुआमला न तय करेंगे, तो मैं जाब्ते से उसे आपको दिला दूँगा।
मिस्टर जोज़फ क्लार्क जिला के हाकिम थे। अभी थोड़े ही दिनों से यहाँ आए थे। मिसेज़ सेवक ने उनसे रब्त-जब्त पैदा कर लिया था। वास्तव में उन्होंने क्लार्क को सोफी के लिए चुना था। दो-एक बार उन्हें अपने घर बुला भी चुकी थीं। गृह-निर्वासन से पहले दो-तीन बार सोफी से उनकी मुलाकात भी हो चुकी थी; किंतु वह उनकी ओर विशेष