राजा साहब-लेकिन मैं नगर के मुख्य व्यवस्थापक की हैसियत से एक व्यक्ति के यथार्थ या कल्पित हित के लिए नगर का हजारों रुपये का नुकसान तो नहीं करा सकता? कारखाना खुलने से हजारों मनुष्यों की जीविका चलेगी, नगर की आय में वृध्दि होगी, सबसे बड़ी बात यह है कि उस अमित धान का भाग देश में रह जाएगा, जो सिगरेट के लिए अन्य देशों को देना पड़ता है।

इंदु ने राजा के मुँह की ओर तीव्र दृष्टि से देखा। सोचा-इनका अभिप्राय क्या है? पूँजीपतियों से तो इन्हें विशेष प्रेम नहीं है। यह तो सलाह,नहीं, बहस है। क्या अधिकारियों के दबाव से इन्होंने जमीन को मिस्टर सेवक के अधिकार में देने का फैसला कर लिया है और मुझसे अपने निश्चय का अनुमोदन कराना चाहते हैं? इनके भाव से तो कुछ ऐसा ही प्रकट हो रहा है। बोली-इस दृष्टिकोण से तो यही न्यायसंगत है कि सूरदास की जमीन छीन ली जाए।

राजा साहब-भई,


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करते रहे; लेकिन राजा साहब ने कोई संतोषजनक उत्तर न दिया। निराश होकर आए और मिसेज़ सेवक से सारा वृत्तांत कह सुनाया।

मिसेज़ सेवक को हिंदुस्तानियों से चिढ़ थी। यद्यपि इसी देश के अन्न-जल से उनकी सृष्टि हुई थी, पर अपने विचार से हजरत ईसा की शरण में आकर, वह हिंदुस्तानियों के अवगुणों से मुक्त हो चुकी थीं। उनके विचार में यहाँ के आदमियों को खुदा ने सज्जनता, सहृदयता, उदारता, शालीनता आदि दिव्य गुणों से सम्पूर्णत: वंचित रक्खा है। वह योरपीय सभ्यता की भक्त थीं और


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