कमिश्नर-नहीं-नहीं, कभी नहीं।
राजा साहब-मुझे आपसे पूरी सहायता मिलनी चाहिए।
कमिश्नर-मैं यथाशक्ति आपकी सहायता करूँगा।
राजा साहब-बोर्ड ने मंजूर भी कर लिया, तो मुहल्लेवालों की तरफ से फसाद की आशंका है।
कमिश्नर-कुछ परवा नहीं, मैं सुपरिंटेंडेंट-पुलिस को ताकीद कर दूँगा कि वह आपको मदद करते रहें।
राजा साहब यहाँ से चले, तो ऐसा मालूम होता था, मानो आकाश पर चल रहे हों। यहाँ से वह मि. क्लार्क के पास गए और वहाँ भी इसी नीति से काम लिया। दोपहर को घर आए। उनके हृदय में यह खयाल खटक रहा था कि इस बहाने से मेरा काम तो निकल गया; लेकिन मैं सूरदास के साथ कहीं ऐसी ज्यादती तो नहीं कर रहा हूँ कि अंत में मुझे नगरवासियों के सामने लज्जित होना पड़े? इसी विषय में बातचीत करने के लिए वह इंदु के पास आए और बोले-तुम कोई जरूरी काम तो नहीं कर रही हो? मुझे एक बात में तुमसे कुछ सलाह करनी है।
है, शायद हड्डी टूट गई है, डॉक्टर को दिखाना चाहता हूँ; मगर उसकी फीस के लिए रुपयों की जरूरत है।
जैनब-बेटा, भला सोचो तो, मेरे पास रुपये कहाँ से आएँगे, तुम्हारे सिर की कसम खाकर कहती हूँ। मगर तुम डॉक्टर को बुलाओ ही क्यों? तुम्हें सीधो साहब के यहाँ जाना चाहिए। यह हंगामा उन्हीं की बदौलत तो हुआ है, नहीं तो यहाँ हमसे किसी को क्या गरज थी। एक इक्का मँगवा लो और साहब के यहाँ चले जाओ। वह एक रुक्की लिख देंगे, तो सरकारी शिफाखाने में खासी तरह इलाज हो जाएगा। तुम्हीं सोचो, हमारी हैसियत डॉक्टर बुलाने की है?