भी कुछ तय-कराई मिलनेवाली होगी, तभी इतनी खैरखाही कर रहे हो।

जगधार-उनसे जो कुछ मिलनेवाला हो, वह हमीं से ले लीजिए, और उनसे कह दीजिए, जमीन न मिलेगी। आप लोग झाँसेबाज हैं, ऐसा झाँसा दीजिए कि साहब की अकिल गुम हो जाए।

ताहिर-खैरख्वाही रुपये के लालच से नहीं है। अपने मालिक की ऑंख बचाकर एक कौड़ी भी लेना हराम समझता हूँ। खैरख्वाही इसलिए करता हूँ कि उनका नमक खाता हूँ।

जगधार-अच्छा साहब, भूल हुई, माफ कीजिए। मैंने तो संसार के चलन की बात कही थी।

ताहिर-तो सूरदास, मैं साहब से जाकर क्या कह दूँ?

सूरदास-बस, यही कह दीजिए कि जमीन न बिकेगी।

ताहिर-मैं फिर कहता हूँ, धोखा खाओगे। साहब जमीन लेकर ही छोड़ेंगे।

सूरदास-मेरे जीते-जी तो जमीन न मिलेगी। हाँ, मर जाऊँ तो भले ही मिल जाए।

ताहिर अली चले गए, तो भैरों बोला-दुनिया


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सूरदास ने सोचा था, अभी किसी से यह बात न कहूँगा, पर इस समय दूध लेने के लिए खुशामद जरूरी थी। अपना त्याग दिखाकर सुर्खरू बनना चाहता था।

बजरंगी-तुम हामी भरते, तो यहाँ कौन उसे छोड़े देता था। तीन-चार गाँवों के बीच में वही तो जमीन है। वह निकल जाएगी, तो हमारी गायें और भैंसें कहाँ जाएँगी?

जमुनी-मैं तो इन्हीं के द्वार पर सबको बाँध आती।

सूरदास-मेरी जान निकल जाए, तब तो बेचूँ ही नहीं, हजार-पाँच सौ की क्या गिनती। भौजी, एक घूँट दूध हो तो दे


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