घंटे इंतजार से झुँझला गए थे, खड़े-खड़े बोले-आपको अवकाश हो, तो मैं कुछ कहूँ, नहीं तो फिर कभी आऊँगा।
कमिश्नर साहब ने रुखाई से पूछा-मैं पहले आपसे यह पूछना चाहता हूँ कि इस पत्र ने आपके विषय में जो आलोचना की है, वह आपकी नजर से गुजरी है?
राजा साहब-जी हाँ, देख चुका हूँ।
कमिश्नर-आप इसका कोई जवाब देना चाहते हैं?
राजा साहब-मैं इसकी कोई जरूरत नहीं समझता; अगर इतनी-सी बात पर मुझ पर अविश्वास किया जा सकता है और मेरी बरसों की वफादारी का कुछ विचार नहीं किया जाता, तो मुझे विवश होकर अपना पद-त्याग करना पड़ेगा। अगर आप वहाँ जाते, तो क्या इस पत्र को इतना साहस होता कि आपके विषय में यही आलोचना करता? हरगिज नहीं। यह मेरे भारतवासी होने का दंड है। जब तक मुझ पर ऐसी द्वेषपूर्ण टीका-टिप्पणी होती रहेगी, मैं नहीं समझ सकता कि अपनेर् कर्तव्य का कैसे पालन कर सकूँगा।
जमुनी थरथराकर पैरों पर गिर पड़ी और बोली-बीबी, जो हुकुम हो, उसके लिए हाजिर हूँ।
जैनब ने चोट-पर-चोट लगाई और जमुनी के बहुत रोने-गिड़गिड़ाने पर 25 रुपये लेकर जिन्नात से उसे अभय-दान दिया। घर गई, रुपये लाकर दिए और पैरों पर गिरी; मगर बजरंगी से यह बात न कही। वह चली तो जैनब ने हँसकर कहा-खुदा देता है तो छप्पर फाड़कर देता है। इसका तो सान-गुमान भी न था। तुम बेसब्र हो जाती हो, नहीं तो मैंने कुछ-न-कुछ और ऐंठा होता। सवार को चाहिए कि बाग हमेशा कड़ी रखे।