जब सूरदास ने साहब के सामने इनकार कर दिया, तो फिर कौन-सी बात बाकी रह गई?
बजरंगी-इन्होंने सोचा होगा कि पंडाजी को बीच में डालकर काम निकाल लेंगे। साहब से कह देना, यहाँ साहबी न चलेगी।
ताहिर-तुम अहीर हो न, तभी इतने गर्म हो रहे हो। अभी साहब को जानते नहीं हो, तभी बढ़-बढ़कर बातें कर रहे हो। जिस वक्त साहब ज़मीन लेने पर आ जाएँगे, ले ही लेंगे, तुम्हारे रोके न रुकेंगे। जानते हो, शहर के हाकिमों से उनका कितना रब्त-जब्त है? उनकी लड़की की मँगनी हाकिम-जिला से होनेवाली है। उनकी बात को कौन टाल सकता है? सीधो से, रजामंदी के साथ दे दोगे, तो अच्छे दाम पा जाओगे; शरारत करोगे, तो जमीन भी निकल जाएगी, कौड़ी भी हाथ न लगेगी। रेलों के मालिक क्या जमीन अपने साथ लाए थे? हमारी ही जमीन तो ली है? क्या उसी कायदे से यह जमीन नहीं निकल सकती?
बजरंगी-तुम्हें
पी रहा था। उसकी स्त्री जमुनी खाना पकाती थी। ऑंगन में तीन भैंसें और चार-पाँच गायें चरनी पर बँधी हुई चारा खा रही थीं। बजरंगी ने कहा-कैसे चले सूरे? आज बग्घी पर कौन लोग बैठे तुमसे बातें कर रहे थे?
सूरदास-वही गोदाम के साहब थे।
बजरंगी-तुम तो बहुत दूर तक गाड़ी के पीछे दौड़े, कुछ हाथ लगा?
सूरदास-पत्थर हाथ लगा। ईसाइयों में भी कहीं दया-धर्म होता है। मेरी वही जमीन लेने को कहते थे।
बजरंगी-गोदाम के पीछेवाली न?
सूरदास-हाँ वहीं, बहुत लालच देते रहे, पर मैंने हामी नहीं भरी।