की तरफ से चले। बग्घी भी आगे बढ़ी। कोचवान ने पूछा-हुजूर गईं क्यों नहीं? सरकार बुरा मान गए।
इंदु ने इसका कुछ जवाब न दिया। वह सोच रही थी-क्या मुझसे फिर भूल हुई? क्या मेरा जाना उचित था? क्या वह शुध्द हृदय से मेरे जाने के लिए आग्रह कर रहे थे या एक थप्पड़ लगाकर दूसरा थप्पड़ लगाना चाहते थे? ईश्वर ही जानें। वही अंतर्यामी हैं, मैं किसी के दिल की बात क्या जानूँ!
गाड़ी धीरे-धीरे आगे बढ़ती जाती थी। आकाश पर छाए हुए बादल फटते जाते थे; पर इंदु के हृदय पर छाई हुई घटा प्रतिक्षण और भी घनी होती जाती थी-आह! क्या वस्तुत: हमारे ग्रहों में कोई मौलिक विरोध है, जो पग-पग पर मेरी आकांक्षाओं को दलित करता रहता है? मैं कितना चाहती हूँ कि उनकी इच्छा के विरुध्द एक कदम भी न चलूँ; किंतु यह प्रकृति-विरोध मुझे हमेशा नीचा दिखाता है। अगर वह शुध्द मन से अनुरोध कर
ताहिर-हाँ, मुझे भी ऐसा ही खौफ होता है, मगर डॉक्टर को बुलाऊँ तो उसकी फीस के रुपये कहाँ से आवेंगे?
कुल्सूम-तनख्वाह तो अभी मिली थी, क्या इतनी जल्द खर्च हो गई?
ताहिर-खर्च तो नहीं हो गई, लेकिन फीस की गुंजाइश नहीं है। अबकी माहिर की तीन महीने की फीस देनी होगी। 12 रुपये तो फीस ही के निकल जाएँगे, सिर्फ 18 रुपये बचेंगे! अभी तो पूरा महीना पड़ा हुआ है। क्या फाके करेंगे?
कुल्सूम-जब देखो, माहिर की फीस का तकाजा सिर पर सवार रहता है। अभी दस दिन हुए, फीस दी नहीं गई?