इंदु-ख्वाब तो नहीं देख रहा है!
कोचवान-लीजिए, हुजूर, यह बराबर आ गई।
इंदु ने घबराकर बाहर देखा, तो सचमुच अपनी ही मोटर थी। गाड़ी के बराबर आकर रुक गई और राजा साहब उतर पड़े कोचवान ने गाड़ी रोक दी। इंदु चकित होकर बोली-आप कब आ गए?
राजा-तुम्हारे आने के पाँच मिनट बाद मैं भी चल पड़ा।
इंदु-रास्ते में तो कहीं नहीं दिखाई दिए।
राजा-लाइन की तरफ से आया हूँ। इधार की सड़क खराब है। मैंने समझा, जरा चक्कर तो पड़ेगा, मगर जल्द पहुँचूँगा। तुम स्टेशन के सामने से कैसे लौट आईं? क्या बात है? तबियत तो अच्छी है? मैं तो घबरा गया। आओ, मोटर पर बैठ जाओ। स्टेशन पर गाड़ी आ गई है,दस मिनट में छूट जाएगी। लोग उत्सुक हो रहे हैं।
इंदु-अब मैं न जाऊँगी। आप तो पहुँच ही गए थे।
राजा-तुम्हें चलना ही पड़ेगा।
इंदु-मुझे मजबूर न कीजिए, मैं न जाऊँगी।
कुल्सूम-तुम समझते होगे, वे तुम्हारे मोहताज हैं; मगर उन्हें तुम्हारी रत्ती-भर भी परवा नहीं। सोचती हैं, जब तक मुफ्त का मिले, अपने खजाने में क्यों हाथ लगाएँ। मेरे बच्चे पैसे-पैसे को तरसते हैं और वहाँ मिठाइयों की हाँड़ियाँ आती हैं, उनके लड़के मजे से खाते हैं। देखती हूँ और ऑंखें बंद कर लेती हूँ।
ताहिर-मेरा जो फर्ज है, उसे पूरा करता हूँ। अगर उनके पास रुपये हैं, तो इसका मुझे क्यों अफसोस हो, वे शौक से खाएँ, आराम से रहें। तुम्हारी बातों से हसद की बू आती है। खुदा के लिए मुझसे ऐसी बातें न किया करो।