ली और सोचने लगी-सब लोग मेरा इंतजार कर रहे होंगे; गाड़ी देखते ही पहचान गए थे। अम्माँ कितनी खुश हुई होंगी; पर गाड़ी लौटते देखकर उन्हें और अन्य सब आदमियों को कितना विस्मय हुआ होगा! कोचवान से कहा-जरा पीछे फिरकर देखो, कोई आ तो नहीं रहा है?
कोचवान-हुजूर, कोई गाड़ी तो आ रही।
इंदु-घोड़ों को तेज कर दो, चौगाम छोड़ दो।
कोचवान-हुजूर, गाड़ी नहीं, मोटर है, साफ मोटर है।
इंदु-घोड़ों को चाबुक लगाओ।
कोचवान-हुजूर, यह तो अपनी ही मोटर मालूम होती है, हींगनसिंह चला रहे हैं। खूब पहचान गया, अपनी ही मोटर है।
इंदु-पागल हो, अपनी मोटर यहाँ क्यों आने लगी?
कोचवान-हुजूर, अपनी मोटर न हो, तो जो चोर की सजा, वह मेरी। साफ़ नजर आ रही है, वही रंग है। ऐसी मोटर इस शहर में दूसरी है ही नहीं।
इंदु-जरा गौर से देखो।
कोचवान-क्या देखूँ हुजूर, वह आ पहुँची, सरकार बैठे हैं।
कुल्सूम-न इतना मिलेगा, न सही; इसका आधा तो मिलेगा! दोंनों वक्त न खाएँगे, एक ही वक्त सही; जान तो आफत में न रहेगी।
ताहिर-तुम एक वक्त खाकर खुश रहोगी, घर में और लोग भी तो हैं, उनके दु:खड़े रोज कौन सुनेगा? मुझे अपनी जान से दुश्मनी थोड़े ही है; पर मजबूर हूँ। खुदा को जो मंजूर होगा, वह पेश आएगा।
कुल्सूम-घर के लोगों के पीछे क्या जान दे दोगे?
ताहिर-कैसी बातें करती हो, आखिर वे लोग कोई गैर तो नहीं हैं? अपने ही भाई हैं, अपनी माँएँ हैं। उनकी परवरिश मेरे सिवा और कौन करेगा?