हो रही थीं कि सैयद ताहिर अली आकर खड़े हो गए, और नायकराम से बोले-पंडाजी, मुझे आपसे कुछ कहना है, जरा इधार चले आइए।

बजरंगी-उसी जमीन के बारे में कुछ बातचीत करनी है न? वह जमीन न बिकेगी।

ताहिर-मैं तुमसे थोड़े ही पूछता हूँ। तुम उस जमीन के मालिक-मुख्तार नहीं हो।

बजरंगी-कह तो दिया, वह जमीन न बिकेगी, मालिक-मुख्तार कोई हो।

ताहिर-आइए पंडाजी, आइए, इन्हें बकने दीजिए।

नायकराम-आपको जो कुछ कहना हो कहिए; ये सब लोग अपने ही हैं, किसी से परदा नहीं है। सुनेंगे, तो सब सुनेंगे, और जो बात तय होगी, सबकी सलाह से होगी। कहिए, क्या कहते हैं?

ताहिर-उसी जमीन के बारे में बातचीत करनी थी।

नायकराम-तो उस जमीन का मालिक तो आपके सामने बैठा हुआ है। जो कुछ कहना है, उसी से क्यों नहीं कहते? मुझे बीच में दलाली नहीं खानी है।


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सूरदास-बेटा, बहुत अच्छा गुड़ है, खाओ तो। देखो, कैसी नरम-नरम रोटियाँ हैं। गेहूँ की हैं।

मिट्ठू-मैं न खाऊँगा।

सूरदास-तो क्या खाओगे बेटा? इतनी रात गए और क्या मिलेगा?

मिट्ठू-मैं तो दूध-रोटी खाऊँगा।

सूरदास-बेटा, इस जून खा लो। सबेरे मैं दूध ला दूँगा।

मिट्ठू रोने लगा। सूरदास उसे बहलाकर हार गया, तो अपने भाग्य को रोता हुआ उठा, लकड़ी सँभाली और टटोलता हुआ बजरंगी अहीर के घर आया, जो उसके झोंपड़े के पास ही था। बजरंगी खाट पर बैठा नारियल


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