दूध जल जाता है, मलाई का नाम नहीं। दूध जब मिलता था, तब मिलता था, एक ऑंच में अंगुल-भर मोटी मलाई पड़ जाती थी।
दयागिरि-बच्चा, अभी अच्छा-बुरा कुछ मिल तो जाता है। वे दिन आ रहे हैं कि दूध ऑंखों में ऑंजने को भी न मिलेगा।
भैरों-हाल तो यह है कि घरवाली सेर के तीन सेर बनाती है, उस पर दावा यह कि हम सच्चा माल बेचते हैं। सच्चा माल बेचो, तो दिवाला निकल जाए। यह ठाट एक दिन न चले।
बजरंगी-पसीने की कमाई खानेवालों का दिवाला नहीं निकलता; दिवाला उनका निकलता है, जो दूसरों की कमाई खा-खाकर मोटे पड़ते हैं। भाग को सराहो कि शहर में हो; किसी गाँव में होते, तो मुँह में मक्खियाँ आतीं-जातीं। मैं तो उन सबोंकों को पापी समझता हूँ, जो औने-पौने करके, इधार का सौदा उधार बेचकर अपना पेट पालते हैं। सच्ची कमाई उन्हीं की है, जो छाती फाड़कर धरती से धान निकालते हैं।
द्वार पर टट्टी लगाई और सड़क पर जाकर एक बनिए की दूकान से थोड़ा-सा आटा और एक पैसे का गुड़ लाया। आटे को कठौती में गूँधा और तब आधा घंटे तक चूल्हे के सामने खिचड़ी का मधुर आलाप सुनता रहा। उस धुंधले प्रकाश में उसका दुर्बल शरीर और उसका जीर्ण वस्त्र मनुष्य के जीवन-प्रेम का उपहास कर रहा था।
हाँडी में कई बार उबाल आए, कई बार आग बुझी। बार-बार चूल्हा फँकते-फूँकते सूरदास की आंखों से पानी बहने लगता था। ऑंखें चाहे देख न सकें, पर रो सकती हैं। यहाँ