जमीन का मामला करने पर राजी हो गया हो; पर साहब ने इधार ऑंख उठाकर भी देखा, तो बँगले में आग लगा दूँगा। (मुस्कराकर) भैरों मेरी मदद करेंगे ही।
भैरों-पंडाजी, तुम लोग मेरे ऊपर सुभा करते हो, पर मैं जवानी की कसम खाता हूँ, जो उसके झोंपड़े के पास भी गया होऊँ। जगधार मेरे यहाँ आते-जाते हैं, इन्हीं से ईमान से पूछिए।
नायकराम-जो आदमी किसी की बहू-बेटी पर बुरी निगाह करे, उसके घर में आग लगाना बुरा नहीं। मुझे पहले तो विश्वास नहीं आता था;पर आज उसके मिजाज का रंग बदला हुआ है।
बजरंगी-पंडाजी, सूर को तुम आज 30 बरसों से देख रहे हो। ऐसी बात न कहो।
जगधार-सूरे में और चाहे जितनी बुराइयाँ हों, यह बुराई नहीं है।
भैरों-मुझे ऐसा जान पड़ता है कि हमने हक-नाहक उस पर कलंक लगाया। सुभागी आज सबेरे आकर मेरे पैरों पर गिर पड़ी और तब से घर से बाहर नहीं निकली। सारे दिन अम्माँ की सेवा-टहल करती रही।
दूँ-बहन, मेरा कुछ वश नहीं है। मैं कहने को रानी हूँ, वास्तव में मुझे उतनी स्वाधीनता भी नहीं है, जितनी मेरे घर की महरियों को। लेकिन यह सोचकर रह जाती थी कि पति-निंदा मेरी धर्म-मर्यादा के प्रतिकूल है। सोफी की निगाहाें से गिर जाऊँगी। वह समझेगी, इसमें जरा भी आत्माभिमान नहीं है।
नौ बजे विनयसिंह उससे मिलने आए। वह मानसिक अशांति की दशा में बैठी हुई अपने संदूकों में से सोफी के लिए खरीदे हुए कपड़े निकाल रही थी और सोच रही थी कि इन्हें उनके पास कैसे भेजूँ। खुद